October 1, 2026

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रामपुर तिराहा के 32 वर्ष: न्याय की शुरुआत हुई है, पर हमारा कर्तव्य अभी समाप्त नहीं हुआ

देश के बाकी हिस्सों के लिए 2 अक्टूबर महात्मा गांधी और उनके अहिंसा के संदेश का स्मरण दिवस है। लेकिन उत्तराखंड के लिए यह तारीख एक असहनीय विरोधाभास लिए हुए है। 1994 में गांधी जयंती के दिन, पृथक पर्वतीय राज्य की मांग को लेकर शांतिपूर्वक दिल्ली जा रहे नागरिकों को रामपुर तिराहे पर रोका गया, उन्हें पीटा गया, उन पर गोलियां चलाई गईं, उन्हें लूटा गया और उनके साथ भयावह यौन हिंसा की गई। यह सब उन्हीं बलों ने किया, जिन्हें उनकी रक्षा का दायित्व सौंपा गया था।
बत्तीस वर्ष बीत चुके हैं, फिर भी रामपुर तिराहा उत्तराखंड की स्मृति में ताज़ा है। यह उस राज्य के लिए चुकाई गई रक्त की कीमत की याद दिलाता है, जो अंततः 9 नवंबर 2000 को अस्तित्व में आया।
3 सितंबर 1994 को जब मुझे गिरफ्तार किया गया, तब मैं 33 वर्ष का था और मुझे बरेली जेल के नेहरू वार्ड में रखा गया। मुझे अलग बंद रखा गया और बाहर की कोई खबर नहीं मिलती थी। लोकतांत्रिक आंदोलन में भाग लेने भर के लिए मुझसे अपराधी जैसा व्यवहार किया गया। नरसंहार के दो दिन बाद, 4 अक्टूबर को ही मुझे रामपुर तिराहे पर हुई गोलीबारी और अत्याचारों की खबर मिली।
उस जेल की कोठरी में मैंने जो दुख, क्रोध और असहायता महसूस की, वह आज तक मेरे भीतर से गई नहीं है।

राज्य हिंसा की वह रात
उत्तराखंड संघर्ष समिति ने जनता की मांग को सीधे राष्ट्रीय राजधानी तक ले जाने का निर्णय लिया। आंदोलनकारियों ने गांधी जयंती पर दिल्ली में शांतिपूर्ण प्रदर्शन की योजना बनाई थी और इसके लिए दिल्ली पुलिस आयुक्त से अनुमति भी ले ली थी। गढ़वाल से लगभग 300 बसें नारसन, छपार और रामपुर तिराहे से होकर गुज़रीं।
रामपुर तिराहे पर, अपर्याप्त रोशनी वाले स्थान पर, राजमार्ग को ट्रकों से अवरुद्ध कर दिया गया था। सैकड़ों आंदोलनकारियों को हिरासत में ले लिया गया। 2 अक्टूबर के तड़के जब और बसें पहुँचीं, तो पुलिस ने लाठीचार्ज किया, आंसू गैस के गोले और रबर की गोलियां चलाईं और फिर असली गोलियां बरसाईं। 303 राइफलों से 24 से अधिक राउंड और स्टेन गनों से 10 राउंड और फायर किए गए।
उच्च न्यायालय ने रविंद्र रावत, गिरीश भद्री, राजेश लखेड़ा, सतेंद्र चौहान और सूर्य प्रकाश शर्मा को मौके पर मारे गए लोगों में नामित किया और राजेश नेगी को लापता दर्ज किया। उत्तराखंड की स्मरण परंपरा में सात शहीदों को याद किया जाता है, जिनमें अशोक कुमार भी शामिल हैं, जिनकी बाद में मृत्यु हुई, तथा लापता राजेश नेगी भी।
गोलीबारी उस अत्याचार का केवल एक हिस्सा थी। सीबीआई और राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा प्रलेखित सामग्री में दर्ज है कि 17 महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की गई, तीन के साथ बसों के भीतर बलात्कार हुआ और चार को घसीटकर पास के खेतों में ले जाकर उनके साथ बलात्कार किया गया।
अपराधियों ने शायद यह मान लिया था कि यौन हिंसा से पहाड़ी समुदायों का अपमान होगा और महिलाएं आंदोलन से बाहर हो जाएंगी। वे उत्तराखंड की मातृशक्ति के साहस को समझ ही नहीं पाए। हमारी महिलाओं ने चुप रहने से इनकार कर दिया। उनके धैर्य ने आंदोलन को और मज़बूत किया और दशकों बाद उनकी गवाही ने अदालतों को दोषियों को जवाबदेह ठहराने में मदद की।

लीपापोती से जवाबदेही तक
उस समय उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की अत्याचारी समाजवादी पार्टी की सरकार थी। उसकी पुलिस और पीएसी कर्मियों ने मार्च को रोका, आंदोलनकारियों को हिरासत में लिया और गोलियां चलाईं। इसके बाद राज्य तंत्र ने पीड़ितों को ही आरोपी बनाने की कोशिश की। पुलिस ने दावा किया कि आंदोलनकारियों से अवैध हथियार और गोला-बारूद बरामद हुए, लेकिन सीबीआई ने बाद में हथियार बरामदगी के 11 कथित मामलों को फर्जी पाया।
उस समय केंद्र में पी. वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार थी। राष्ट्रीय ध्यान आकर्षित होने और नवंबर 1994 में राष्ट्रीय महिला आयोग की रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपे जाने के बावजूद, समय पर जवाबदेही सुनिश्चित करने वाला कोई निर्णायक केंद्रीय राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं हुआ। महत्वपूर्ण स्वतंत्र जांच इसलिए संभव हुई क्योंकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 7 अक्टूबर 1994 को सीबीआई को कार्रवाई करने का निर्देश दिया।
दशकों तक अभियोजन स्वीकृति के विवादों, गुम दस्तावेज़ों और बार-बार की तारीखों के कारण कानूनी कार्यवाही खिंचती रही।
धामी सरकार के कार्यकाल में एक महत्वपूर्ण बदलाव आया। 2023 में मुज़फ्फरनगर की अदालत द्वारा जारी गैर-जमानती वारंटों ने 18 आरोपी पूर्व पुलिसकर्मियों को पेश होने के लिए बाध्य किया, जबकि संरक्षित गवाहों की उपस्थिति से पीड़ितों को लगभग तीन दशक बाद गवाही देने का अवसर मिला।
मार्च 2024 में सेवानिवृत्त पीएसी सिपाहियों मिलाप सिंह और वीरेंद्र प्रताप को सामूहिक बलात्कार, मारपीट और लूट के लिए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। जून 2026 में तत्कालीन थानाध्यक्ष (एसएचओ) बृज किशोर और सेवानिवृत्त सिपाहियों उमेश चंद और अनिल कुमार को साक्ष्य गढ़ने के लिए 18 महीने के कारावास की सजा दी गई और प्रत्येक पर 21,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया। इन फैसलों ने उन पीड़ितों को न्याय का एहसास कराया जिन्होंने लगभग तीन दशकों तक अपना आघात सहा और न्याय की लड़ाई लड़ी।
उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने भी अनसुलझे मामलों की ओर ध्यान बनाए रखा है। मई 2026 में न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित ने सीबीआई को निर्देश दिया कि वह तत्कालीन जिलाधिकारी अनंत कुमार सिंह से संबंधित कार्यवाही की स्थिति पर 15 दिन के भीतर रिपोर्ट दे। ये घटनाक्रम पुष्टि करते हैं कि उच्चस्तरीय (कमांड-स्तर की) जवाबदेही तय करने का प्रयास अभी समाप्त नहीं हुआ है।
ये उपलब्धियां दर्शाती हैं कि हमने उत्तराखंड केवल एक नई सीमा खींचने के लिए नहीं मांगा था, बल्कि एक ऐसा राज्य बनाने के लिए मांगा था जो अपने लोगों का सम्मान करे, महिलाओं की रक्षा करे और लोकतांत्रिक असहमति का आदर करे।

नीति के माध्यम से सम्मान
धामी सरकार प्रतीकात्मक स्मरण से आगे बढ़ी है। चिह्नित राज्य आंदोलनकारियों और पात्र आश्रितों को सरकारी नौकरियों में 10% क्षैतिज आरक्षण देने वाले कानून को अगस्त 2024 में राज्यपाल की मंजूरी मिली। इससे एक पुरानी मांग कानूनी रूप से संरक्षित अधिकार बन गई।
सरकार ने मान्यता प्राप्त आंदोलनकारियों के लिए पेंशन, पहचान पत्र और निःशुल्क परिवहन सुविधाएं जारी रखी हैं और रामपुर तिराहा स्मारक के पुनर्विकास की घोषणा की है। योजनाओं में स्मरण किए जाने वाले सात शहीदों की प्रतिमाएं स्थापित करना, संग्रहालय का विस्तार, आगंतुकों के लिए सुविधाएं बनाना और उत्तराखंड की बसों के लिए स्टॉपेज उपलब्ध कराना शामिल है।

शहीदों से हमारा वचन
उत्तराखंड के गठन के पच्चीस वर्ष बाद मैं कृतज्ञता और उत्तरदायित्व, दोनों महसूस करता हूँ। कृतज्ञता उन लोगों के प्रति जिन्होंने जेल, गोलियों और बलिदान के बीच आंदोलन को जीवित रखा; अटल बिहारी वाजपेयी के प्रति, जिनकी सरकार ने उस आकांक्षा को राज्य का रूप दिया; और हर उस नागरिक के प्रति जिसने उत्तराखंड के निर्माण में योगदान दिया है।
लेकिन कृतज्ञता कभी आत्मसंतोष में नहीं बदलनी चाहिए। रामपुर तिराहे ने हमें अनसुना किए जाने की भयावह कीमत सिखाई है। अगले 25 वर्षों में हमें ऐसा उत्तराखंड बनाना है जहां युवाओं को शिक्षा और रोज़गार मिले और उन्हें अपने गांव छोड़ने को मजबूर न होना पड़े; जहां विकास हिमालय का सम्मान करे; जहां महिलाएं गरिमा और सुरक्षा के साथ रहें; और जहां किसी पीड़ित को न्याय के लिए तीन दशक तक प्रतीक्षा न करनी पड़े।
धामी सरकार का 2047 तक विकसित उत्तराखंड का संकल्प, जो रोज़गार, टिकाऊ विकास, शोध-आधारित नीति, संतुलित विकास और जवाबदेह शासन पर केंद्रित है, इस ऐतिहासिक उत्तरदायित्व को आगे ले जाने वाला होना चाहिए।
रामपुर तिराहे के शहीदों से हमारा यही वचन है। हम याद रखेंगे कि गोलियां किसने चलाईं, साक्ष्य किसने गढ़े और कौन चुप रहा। हम यह भी याद रखेंगे कि उत्तराखंड को अंततः किसने बनाया और अब उनकी कुर्बानी की विरासत पाने वाली पीढ़ियों के लिए न्याय, गरिमा और अवसर सुनिश्चित करने में कौन जुटा है।

लेखक
श्री विनोद चमोली
विधायक एवं प्रदेश प्रवक्ता भाजपा
सक्रिय राज्य निर्माण आंदोलनकारी

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