चरित्रवान समाज के लिए पारिवारिक मर्यादा और आर्थिक शुचिता का संरक्षण आवश्यक : डाॅ0 सुशील कोटनाला
जब हम चरित्र की की बात करते हैं तो सर्वप्रथम यौन चरित्र ही आचरण का परिचायक होता है।यदि कोई भी स्त्री या पुरुष कौमार्यता अथवा वैवाहिक पवित्रता या शुद्धता से च्युत होते हैं तो यह शत-प्रतिशत चरित्रहीनता में ही आता है। हमारे शास्त्रों ने भी तथा संविधान ने भी 07 वर्षों के अलगाव को नवीन विवाह के लिए मानक स्वीकार किया है।आज महिला व पुरुष बच्चे छोड़कर भाग रहे हैं और एक ही छत के नीचे पति-पत्नी रहते हुए भी अवैध सम्बन्धों में लिप्त होना कुत्ता-बिल्ली वाले यौनाचार के समकक्ष है किन्तु कुतिया और बिल्ली का मातृत्व कभी भी अपने बच्चों को छोड़ने की अनुमति नहीं देता है।उनका अर्थात् अधिकांश मादा पशुओं का मातृत्व प्राकृतिक होता है और अपने बच्चों के लिए प्राण भी न्यौछावर करने के स्तर तक विश्वसनीय होता है आज की आधुनिका स्त्रियों से कहीं अधिक वात्सल्यता उनमें विद्यमान है।पुरुष भी अपने दायित्वों से परांगमुख हो रहे हैं।
चरित्र का दूसरा बड़ा आधार आर्थिक है।यदि हमारे हिसाब-किताब में गड़बड़ी है तो हम कभी भी विश्वासपात्र नहीं बन सकते। समाज हमें आचरण से भ्रष्ट ही समझेगा।
आज इन दोनों प्रकार के आचरणों के संरक्षण की महती आवश्यकता है और इसकी पहल व्यक्ति को स्वयं बिना दूसरों को देखें ही करनी होगी ….. यदि ऐसा हो पाया तो मानवता की सच्ची सेवा हो पाएगी ..
