“गुरु दक्षिणा पर भ्रम नहीं, सत्य जानिए: संघ की आत्मनिर्भरता और पारदर्शिता की परंपरा” : डां. सुशील कोटनाला
मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का बाल्यकाल से स्वयंसेवक हूॅं। आजकल प्रायोजित संघ विरोधी विमर्श के कारण मेरे कतिपय मित्र भी मुझे अंध-भक्ति का व्यंग्य करते से प्रतीत होते हैं,वे संघ के गुरु दक्षिणा कार्यक्रमों पर भी संदेह के वातावरण की निर्मिति का प्रयास कर रहे हैं। मैं इस आलेख के माध्यम से यह स्पष्ट करना चाहता हूॅं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किसी भी प्रकार का चन्दा और दान स्वीकार नहीं करता।संघ किसी भी प्रकार की सरकारी या अर्द्ध सरकारी सहायता अथवा वित्तीय सहायता नहीं लेता।संघ के सभी प्रकार के वार्षिक कार्यों के व्यय की प्रतिपूर्ति (उसके अपने समर्पित स्वयंसेवकों द्वारा प्रदान की गई)गुरु दक्षिणा की धनराशि की आय से सम्पन्न होती है। संघ की गुरु दक्षिणा अत्यन्त पारदर्शी है जिसके पाई-पाई का लेखा प्रमाणित लेखाकार( C.A) द्वारा परीक्षित होता है और मुझ जैसे साधारण आर्थिक स्थिति वाले स्वयंसेवक से लेकर निम्नतम और उच्चतम आर्थिक स्थिति वाले स्वयंसेवकों से प्राप्त गुरु दक्षिणा का समग्र तथा अविरल विवरण विधिवत सुरक्षित रखा जाता है। गुरु दक्षिणा देने वाले स्वयंसेवकों द्वारा स्वेच्छा से समर्पण राशि दी जाती है और यह प्रतिवर्ष (यथासंभव) बढ़ते क्रम में होती है। पुनः दुहराना उचित होगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ श्री गुरु दक्षिणा से प्राप्त समर्पण राशि के अतिरिक्त किसी भी प्रकार का आर्थिक अनुदान किसी भी स्रोत से नहीं लेता है। पूर्ण समर्पित आजीवन व्रती (पूर्ण कालिक) प्रचारकों का प्रवास तथा भोजन एवं वस्त्रों का व्यय, व्यक्ति निर्माण के विभिन्न चरणों के प्रशिक्षण,समाज जागरण के विविध कार्यक्रम तथा अनेक सेवा कार्यों सहित दैवीय आपदाओं में त्वरित सहायता के सारे व्यय संघ की संचित श्री गुरु दक्षिणा राशि से ही वहन किए जाते हैं। संघ के विविध आनुषांगिक संगठनों के आर्थिक पोषण की चिंता भी संघ इसी पवित्र धन से करता है यद्यपि अनेक आनुषांगिक संगठन आत्मनिर्भर और पूर्ण स्वायत्त हैं और उनकी भी अपनी-अपनी पवित्र आर्थिक आत्मनिर्भरता है। मैं बाल्यकाल से ही अविरल श्री गुरु दक्षिणा बढ़ते क्रम से करता आ रहा हूॅं और स्वयं को गौरवान्वित तथा पूर्ण संतुष्ट अनुभव करता हूॅं।लक्ष-लक्ष कार्यकर्ता मुझसे तन-मन-धन की दृष्टि से समर्पण में बहुत आगे हैं, कदाचित इस जीवन में मैं उनकी बराबरी नहीं कर सकता।अपना सर्वस्व समर्पित करने वाले प्रचारक और अनेक गृहस्थ कार्यकर्ताओं को अपने त्याग और समर्पण का लेश मात्र भी अहंकार नहीं है और उनमें से अनेक दधीचि-वृत्ति की विभूतियों की तो मैं चरण-रज के बराबर भी नहीं हूॅं। राममंदिर में मुद्रा की गणना करने वाले कतिपय कर्मचारियों की लोभ-लिप्सा के चौरकर्म का दोष सम्पूर्ण संघ-परिवार पर मढ़ना महापाप और जघन्यतम अपराध है, जिसके लिए मानहानि का वाद भी आहत स्वयंसेवकों द्वारा किया जा सकता है ——- परमात्मा सभी को सद्बुद्धि दें ——
