October 23, 2026

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उत्तराखंड के फॉरेस्ट से गायब हुए वाइल्ड डॉग, जानिए ये कितने महत्वपूर्ण, क्यों बढ़ी चिंता

भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून के शोधकर्ताओं ने उत्तराखंड में जंगली कुत्तों की मौजूदगी को लेकर महत्वपूर्ण अध्ययन प्रकाशित किया है, रिपोर्ट- नवीन उनियाल

देहरादून: उत्तराखंड के जंगलों में कभी बहुतायत में दिखाई देने वाले जंगली कुत्ते अब लंबे अरसे से नजर नहीं आ रहे हैं. जाहिर है कि इससे प्रदेश में इस वन्यजीव के अस्तित्व पर संकट की आशंका बढ़ गई है. जंगली कुत्ते जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र और खाद्य शृंखला का अहम हिस्सा हैं. इनके विलुप्त होने से वन्यजीवों के प्राकृतिक संतुलन पर असर पड़ना लाजमी है. खास बात ये है कि जंगली कुत्तों के पूरी तरह समाप्त होने से वन्यजीव संरक्षण की चुनौतियों, प्रजातियों के संरक्षण और जंगलों में इनके संभावित पुनर्वास की जरूरत पर मंथन हो रहा है और विशेषज्ञों ने भी इसे बड़ी चिंता बताया है.

उत्तराखंड के वनों से गायब हुए जंगली कुत्ते: उत्तराखंड के जंगलों में बाघ, गुलदार और हाथियों की मौजूदगी वन्यजीवों की चर्चा में प्रमुखता से रहती है. लेकिन जंगल की जैव विविधता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहे जंगली कुत्ते धीरे-धीरे चर्चा से भी गायब हो गए हैं.

राजाजी टाइगर रिजर्व के धौलखंड क्षेत्र से लेकर कॉर्बेट के जंगलों तक कभी इनकी मौजूदगी की बात कही जाती थी. वन्यजीवों के व्यवहार और जंगलों पर लंबे समय से नजर रखने वाले लोगों के मुताबिक करीब 15 से 20 साल पहले तक कई इलाकों में जंगली कुत्ते दिखाई देते थे. अब इन क्षेत्रों में इनकी मौजूदगी के नए और पुख्ता प्रमाण सामने नहीं आ रहे हैं.

कभी धौलखंड क्षेत्र में दिखाई देते थे वाइल्ड डॉग: धौलखंड क्षेत्र में 1980 के दशक तक जंगली कुत्तों की अच्छी संख्या होने की बात कही जाती रही है. ये झुंड में रहते थे और हिरण, सांभर तथा दूसरे वन्यजीवों का शिकार करते थे. हालांकि पुराने समय में इनकी वास्तविक संख्या कितनी थी इसका आधिकारिक आंकड़ा मौजूद नहीं है.

WII की स्टडी में उत्तराखंड में मौजूदगी का प्रमाण: भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) देहरादून के शोधकर्ताओं ने उत्तराखंड में जंगली कुत्तों की मौजूदगी को लेकर महत्वपूर्ण अध्ययन प्रकाशित किया है. साल 2018 में Mammalia जर्नल में प्रकाशित शोध पत्र Recent records of dhole in Uttarakhand में उत्तरकाशी जिले के खेड़ा ताल क्षेत्र में कैमरा ट्रैप से एशियाई जंगली कुत्तों की तस्वीरें दर्ज किए जाने की जानकारी दी गई.

NTCA की साल 2018 की रिपोर्ट Status of Leopards, Co-predators and Megaherbivores in India में भी जंगली कुत्तों को संकटग्रस्त प्रजाति के रूप में दर्ज किया गया है. रिपोर्ट के अनुसार इनके ऐतिहासिक वितरण क्षेत्र में कमी के पीछे जंगलों का नुकसान, शिकार की उपलब्धता कम होना और इंसानों की जंगलों के पास बढ़ती गतिविधि कारण रहे हैं.

दूसरे राज्यों में कहां मौजूद हैं जंगली कुत्ते: एशियाई जंगली कुत्ता जिसे ढोल (Dhole) भी कहा जाता है, भारत के कई वन क्षेत्रों में पाया जाता है. इसके प्रमुख वितरण क्षेत्रों में पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट, मध्य भारतीय जंगल और पूर्वोत्तर भारत शामिल हैं. कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और मध्य भारत के कई वन क्षेत्रों में इनकी मौजूदगी दर्ज की गई है. अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय और सिक्किम जैसे क्षेत्रों में भी इनके अध्ययन हुए हैं. हिमालयी क्षेत्रों में इनकी आबादी अपेक्षाकृत कम और बिखरी हुई बताई गई है.

IUCN की रेड लिस्ट में एशियाई जंगली कुत्ते को Endangered यानी संकटग्रस्त श्रेणी में रखा गया है. यह प्रजाति भारत में ही नहीं, बल्कि अपने व्यापक प्राकृतिक वितरण क्षेत्र में भी संरक्षण संबंधी चुनौतियों का सामना कर रही है.

झुंड में शिकार, जंगल के संतुलन में अहम भूमिका: जंगली कुत्तों की खासियत है कि वे सामाजिक समूहों में रहते हैं और मिलकर शिकार करते हैं. शिकार के दौरान झुंड अपने लक्ष्य का पीछा करता है और उसे थकाकर पकड़ने की कोशिश करता है. इनके भोजन में चीतल, सांभर और अन्य मध्यम आकार के खुर वाले वन्यजीव शामिल हो सकते हैं. अलग-अलग जंगलों में इनकी भोजन संबंधी प्राथमिकताएं शिकार की उपलब्धता के अनुसार बदलती हैं.

ये हैं जंगली कुत्तों के गायब होने के कारण: जंगली कुत्तों के घटते वितरण के पीछे आवास का नुकसान, शिकार प्रजातियों की कमी, मानवीय हस्तक्षेप और घरेलू कुत्तों से फैलने वाली बीमारियों जैसे कारणों का उल्लेख विभिन्न शोधों में किया गया है. जंगलों के बीच सड़क, बस्तियों और दूसरी गतिविधियों के बढ़ने से वन्यजीवों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है. खुले में घूमने वाले कुत्तों के संपर्क से रेबीज और कैनाइन डिस्टेंपर जैसी बीमारियों का खतरा भी रहता है.

क्या कहते हैं वरिष्ठ वैज्ञानिक: जंगली कुत्तों को लेकर तमाम अध्ययन और चिंताओं के बीच भारतीय वन्यजीव संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक बिलाल हबीब ने प्रदेश में इनके पूरी तरह से समाप्त होने की आशंका जताई है. बिलाल हबीब ने बताया कि-

जंगली कुत्तों के दोबारा पुनर्वास की कोशिश होनी चाहिए, क्योंकि यह पारिस्थितिकी तंत्र का एक अहम हिस्सा है. करीब 15 से 20 साल पहले तक कुछ जगहों पर इसकी मौजूदगी भी उत्तराखंड में दिखाई देती रही है.
-डॉ बिलाल हबीब, वरिष्ठ वैज्ञानिक, WII-

वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट का मत: वाइल्ड लाइफ पर लंबे समय तक काम करने वाले राजीव मेहता कहते हैं कि-

राजाजी टाइगर रिजर्व में 80 के दशक के दौरान जंगली कुत्तों की अच्छी खासी संख्या थी जो धीरे धीरे कम होती गई. इस क्षेत्र के आसपास लगातार विकास कार्यों और इंसानों की बढ़ती बस्तियों के कारण जंगली कुत्ते की प्रजाति खत्म हो गई और अब ये यहां नहीं दिखाई देते.
-राजीव मेहता, वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट-

वाइल्ड डॉग के संरक्षण की जरूरत: देशभर की तरह उत्तराखंड में भी तमाम संकटग्रस्त वन्यजीवों पर काम हो रहा है. कई के पुनर्वास के लिए भी प्रयास चल रहे हैं. वाइल्ड लाइफ विशेषज्ञ जंगली कुत्तों के मामले में भी इसी तरह के प्रयास की जरूरत बता रहे हैं.

लगातार जंगलों में इकोलॉजिकल बैलेंस के बिगड़ने की बात कही जाती है. ऐसे में विशेषज्ञ भी मानते हैं कि जंगली कुत्तों के आने से संभवतया इकोलॉजिकल बैलेंस में कुछ सुधार आ सके. विशेषज्ञ मानते हैं कि उत्तराखंड को इस दिशा में पहल करनी चाहिए और जंगली कुत्तों की वापसी के लिए बेहतरीन प्लान के साथ प्रयास होने चाहिए.

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