August 9, 2026

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“मौन होकर भी आज मेरे अनेक प्रश्नों का उत्तर देते हैं विद्या दत्त तिवाड़ी” : डां. सुशील कोटनाला

परम पूज्यनीय सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने अत्यंत स्पष्ट शब्दों में कहा कि संघ का कार्य किसी भी प्रकार के लाभ के उद्देश्य से संभव नहीं है।यह कार्य वही कर सकता है जो अपना घर फूंकने के लिए तैयार हो। इसका अनुभव मुझ सहित अनेक स्वयंसेवकों को है। जिनमें से एक मेरे आदरणीय मित्र स्वर्गीय विद्या दत्त तिवाड़ी भी हैं। आपातकाल में लम्बे समय तक कारागार में बन्दी का जीवन व्यतीत करने वाले तिवाड़ी जी अपने नवयौवन में ही एम.ए.,बी.टी.सी.उपाधि से लब्धप्रतिष्ठित थे। वे चाहते तो सरकारी शिक्षक की सम्मान जनक नौकरी कर सकते थे और सेवानिवृत्ति के समय वरिष्ठ प्रधानाध्यापक जूनियर हाईस्कूल के रूप में घर आकर साठ-सत्तर हजार रुपए मासिक पेंशन पा सकते थे।वे विलक्षण और बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न तृतीय वर्ष प्रशिक्षित स्वयंसेवक और कर्मठ कार्यकर्ता थे। प्रयास करने पर वे प्रवक्ता इण्टर कॉलेज या विश्वविद्यालय/महाविद्यालय में प्रोफेसर बन सकते थे। मैंने उनके अनेक ओजस्वी भाषण सुने हैं।वे मुझसे जिद्दू कृष्णमूर्ति से लेकर आचार्य रजनीश (ओशो) तक धाराप्रवाह विद्वतापूर्ण परिचर्चाएं किया करते थे और अपना दृष्टिकोण भी व्यक्त किया करते थे। वे हिन्दू धर्म के प्रति निष्ठावान होते हुए भी विश्व के सभी धर्मों का अध्ययन तथा सम्मान करते थे। हिन्दुत्व से ओतप्रोत शिक्षा, साहित्य,दर्शन तथा जीवन पद्धति पर आधारित उनका चिंतन अत्यन्त गम्भीर था,वे सतही विचारों को पसन्द नहीं करते थे और गहन अध्ययन के पक्षधर थे। जीवित रहते हुए उन्हें कभी कोई आपातकाल के सैनानी का सम्मान या पेंशन नहीं मिली। उनकी धर्मपत्नी श्रीमती रोशनी तिवाड़ी का उन्हें सभी प्रकार का सहयोग प्राप्त हुआ वह पतिव्रता धर्म का पालन करते हुए एक आदर्श हिन्दू नारी के रूप में उनके हृदय रोग का यथासंभव उपचार करवाती रही। पीजीआई चंडीगढ़ से उपचार लेते हुए भी उन्होंने अपना कष्ट कभी सार्वजनिक करने का प्रयास नहीं किया। वे अपना उपचार अपने आर्थिक संसाधनों से करते रहे यद्यपि तत्कालीन विधायक महोदय से भी उन्हें सीमित आर्थिक सहायता उपचारार्थ प्राप्त हुई और मैंने भी कुछ आर्थिक सहयोग किया किन्तु वे इतने स्वाभिमानी थे कि एक वर्ष से पूर्व ही उन्होंने मेरी सम्पूर्ण धनराशि मुझे वापस लौटा दी।वे जीवन में किसी का भी अंश मात्र ऋण अपने ऊपर नहीं रखना चाहते थे।यदि वे राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश करते तो निश्चय ही कठोर शासक के रूप में जनसेवा को समर्पित होकर अमर होते। मैंने विद्यार्थी जीवन में उनके साथ अनेक पदयात्राएं की और जब भी कभी संघ के प्रवास पर नई टिहरी आना होता था तो वे मुझे अपने आत्मीय अनुज का प्रेम उड़ेलते हुए भोजन और रात्रि विश्राम हेतु अपने प्रधानाचार्य आवास पर ले जाते थे। उनकी धर्मपत्नी श्रीमती रोशनी तिवाड़ी जिन्हें मैं दीदी कहता था के द्वारा मुझे पर्याप्त रात्रि-भोज तथा प्रातः कालीन तृप्ति-पूर्ण जलपान करवाया जाता था।वे अपने रथदिव्यांग पति की सेवा हृदय की गहराइयों से करती थी और उनके एक हाथ न होने देने का आभास भी उन्हें नहीं होने देती थी,वह कुशल कार चालिका भी थी और आवश्यकता के समय स्वयं कार चलाकर अपने पतिदेव को इच्छित स्थानों/गंतव्यों तक ले जाती थीं। हृदय रोग का पर्याप्त उपचार के पश्चात भी श्री विद्या दत्त तिवाड़ी जी का हृदयाघात से निधन हो गया,वे मौन होकर मानों अधिक मुखरता से आज भी मेरे अनेक प्रश्नों का उत्तर देते प्रतीत होते हैं —– जिस सरस्वती शिशु मंदिर जोशीमठ से वे 1975 (आपातकाल के समय) में गिरफ्तार किए गए कालान्तर में 1981से 1985 तक उसी सरस्वती शिशु मंदिर का मैं विद्यार्थी रहा हूॅं।वे सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज नई टिहरी से एक यशस्वी प्रधानाचार्य के रूप में सेवा निवृत्त हुए अपार सम्मान और अखण्ड गरिमा होते हुए भी बिना किसी पेंशन के भी वे मुझे आज के वेतन लेवल 14/15 के वरिष्ठ प्रोफेसर से भी अधिक पेंशन के अधिकारी होने के पश्चात भी वे स्वयं उन्हीं के कारण उपेक्षित लगे और एक संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता के रूप में सिद्धान्तों के प्रति समर्पित होने के कारण अपने प्रति कठोर प्रतीत हुए। पूज्य सरसंघचालक के वक्तव्य से अनायास ही स्वर्गीय अधीश जी, स्वर्गीय ज्योति स्वरूप जी, स्वर्गीय डाo नित्यानंद जी, स्वर्गीय विद्या दत्त तिवाड़ी जी तथा स्वर्गीय धर्मवीर जी का स्मरण हो आया और स्वर्गीय विद्या दत्त तिवाड़ी जी के प्रति भावों ने शब्दों का रूप धारण कर लिया ……. अनेक कर्मठ कार्यकर्ताओं के मौन समर्पण ने ही संघ को आकार और विस्तार देने के साथ ही अथाह गहराई भी प्रदान की है —-