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डेगूं के डंक से सारा देश परेशान है। लेकिन कोलकाता नगर निगम ने अपने यहां मच्छरों की बढ़ती आबादी रोकने के लिए नया तरीका खोज निकाला है। इसके तहत अब मच्छरों की तलाश और उन्हें समाप्त करने के लिए मानव श्रम की जरूरत नहीं पड़ेगी। यह काम कोलकाता नगर निगम अब ड्रोन के जिम्मे छोड़ने जा रही है। खास किस्म का ड्रोन इस काम के लिए लगाया जा रहा है। इसमें वह सारी विशेषताएं हैं, जिससे यह बिना किसी मदद से आसमान में उड़ते हुए विभिन्न इलाकों में मच्छरों का पता लगा सकता है। साथ ही इसमें यह विशेषता जोड़ी गयी है कि मच्छरों की जमात का पता चलने के बाद उन्हें समाप्त करने के लिए वह दवा का छिड़काव भी कर सकता है।

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कोलकाता नगर निगम अपने इलाके में डेंगू, चिकनगुनिया और मलेरिया के प्रकोप को रोकने के प्रति चिंतित थी। कई तरीके आजमाये जाने के बाद भी मच्छरों की आबादी को बढ़ने से रोकने में अपेक्षित सफलता नहीं मिल पायी थी। इसी वजह से नई वैज्ञानिक खोज को इस काम में आजमाने का यह फैसला कोलकाता नगर निगम द्वारा लिया गया है। इस किस्म के ड्रोन का विकास पहले ही आइआइटी मुंबई के शोधकर्ताओं ने किया था। उस मॉडल का नाम तब मारूत रखा गया था। अब कोलकाता नगर निगम द्वारा जिस ड्रोन का इस्तेमाल किया जाने वाला है, उसका नाम विनाश है।

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कोलकाता नगर निगम ने इसकी घोषणा की है इस नये किस्म के ड्रोन के बारे में जो जानकारी बाहर आयी है, उसके मुताबिक यह ड्रोन करीब बीस मंजिली इमारत से अधिक ऊंचाई पर उड़ते हुए उन इलाकों को खोज सकती है, जहां मच्छर पनप रहे हैं। उसके पास जीपीएस पद्धति है, जिससे नियंत्रण कक्ष को सदैव यह पता चलता रहेगा कि यह ड्रोन अभी कोलकाता नगर निगम के किस इलाके में उड़ रहा है। अपनी उड़ान के दौरान यह ड्रोन अपनी नजर में आने वाले भवनों और अन्य इलाकों की तस्वीरें भी भेजता रहेगा। कोलकाता के कई इलाके घनी आबादी की वजह से कोलकाता नगर निगम की नियमित जांच से वंचित रह जाते हैं।

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कोलकाता नगर निगम के उप महापौर अतिन घोष ने यह विधि आजमाये जाने की जानकारी गुरुवार को दी है। जिन इलाकों की यह ड्रोन पहचान करेगा, उनकी भौतिक जांच कर ली जाएगी। यदि ड्रोन के आंकड़े सही हुए और इन इलाकों में मच्छरों की आबादी हुई तो यह ड्रोन ही वहां मच्छर मारने की दवा का छिड़काव भी करेगा। इस काम के लिए इस्तेमाल होने वाले ड्रोन में इसके लिए खास इंतजाम किया गया है। ड्रोन में एक खास डब्बा लगाया गया है। इस डब्बे में मच्छर मारने की दवा होगी। खास इलाके में ड्रोन द्वारा दवा छिड़के जाने के पहले लोगों को तेज ध्वनि संकेत के द्वारा आगाह भी कर दिया जाएगा। इस हूटर के बजने से लोग यह समझ जाएंगे कि उनके इलाके में ड्रोन द्वारा मच्छर मारने की दवा का छिड़काव प्रारंभ होने जा रहा है।

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श्री घोष के मुताबिक इस ड्रोन में नमूने एकत्रित करने के लिए मशीनी बांह भी लगाये गये हैं। जरूरत पड़ने पर यह नीचे उतरकर अपने काम के नमूने भी एकत्रित कर साथ ले आयेगा। जिनकी प्रयोगशाला में अलग से जांच की जाएगी। जांच के लिए यह ड्रोन मिट्टी के अलावा पानी के नमूने भी अपने साथ ला सकता है। इनकी जांच से वहां मच्छरों अथवा बीमारी फैलाने वाले अन्य जीवाणुओं की मौजूदगी का पता प्रयोगशाला में चल पायेगा। आम तौर पर कोलकाता नगर निगम के इलाके में घनी आबादी के बीच अनेक ऐसे इलाके हैं, जहां कोलकाता नगर निगम के कर्मचारी पहुंच भी नहीं पाते हैं। अब ड्रोन की मदद से उन सभी इलाकों की क्रमवार तरीके से पहचान हो पायेगी। पहचान होने के बाद वहां अगर मच्छरों की आबादी पायी गयी तो ड्रोन अथवा कर्मचारियों के द्वारा मच्छर मारने की दवा का छिड़काव किया जाएगा। इससे मच्छरों की आबादी को नियंत्रित करने में काफी मदद मिलेगी।

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ड्रोन में खास डब्बा इसलिए लगाया गया है ताकि मच्छरों के लार्वा वाले इलाकों में यह खुद ही दवा का छिड़काव कर मच्छरों को जड़ से समाप्त कर सके। उस फंगस का पता चला है जो 99 प्रतिशत मच्छर मार सकता है हाल ही में वैज्ञानिक अनुसंधान में उस फंगस का पता लगाया गया है जो किसी खास इलाके में मौजूद 99 प्रतिशत मच्छरों की मार सकता है। इस फंगस को प्रयोगशाला में तैयार किया गया है। इसके लिए फंगस की जेनेटिक संरचना में बदलाव भी किये गये हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकडों के मुताबिक यह फंगस मकड़े के जहर के जैसा है। इसके प्रयोग से मलेरिया फैलाने वाले विषाणु ढोने वाले मच्छर भी मारे जा सकते हैं।

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उल्लेखनीय है कि पूरी दुनिया में मलेरिया के बढ़ते प्रकोप की वजह से हर साल करीब चार लाख लोग मारे जा रहे हैं। इनलोगों तक मलेरिया उन्नत ईलाज उपलब्ध नहीं है। दूसरी तरफ मलेरिया के विषाणुओं ने सामान्य दवाइयों के असर से खुद को बचाने का प्रतिरोध अपने अंदर तैयार कर रखा है। इसी वजह से लगातार रोगियों की संख्या मच्छरों वाले इलाकों में बढ़ती ही जा रही है।

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