महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू [फाइल फोटो]
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तमाम मित्रों को यह तथ्य बताना बहुत जरूरी हो गया है कि एक समय नेहरू जी शाहखर्च , और ऐश्वर्य का जीवन जीते रहे हैं। इस में कोई शक नहीं। सिगरेट , कपड़े सारी बातें सही हैं। लेकिन यह बातें तब की हैं जब तक वह गांधी के संपर्क में नहीं आए थे। लेकिन नेहरू जब गांधी के संपर्क में आए तब तो सूत कातने लगे। अपने हाथ का काता हुआ, बुना हुआ कपड़ा ही पहनने लगे। शाहखर्च और ऐश्वर्य की दुनिया से बाहर आ गए।

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वह गांधी युग था। शुचिता और नैतिकता का युग। नहीं पढ़िएगा और खोजिएगा तो पाइएगा कि एक समय सरदार पटेल का जीवन भी मंहगी सिगरेट, शराब और ऐश्वर्य में डूबा हुआ मिलेगा। लेकिन गांधी की संगति में आते ही वह बदल गए। नहीं एक घटना यह भी घटी कि अहमदाबाद क्लब में गांधी आए। पटेल की मेज के पास से गुजर गए। और पटेल ने गांधी की नोटिस नहीं ली और सिगरेट पीते हुए ब्रिज खेलते रहे। सो नेहरू, पटेल ही नहीं, गांधी समेत बहुतेरों की बहुतेरी बातें हैं।

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नेहरू युग की बात छोड़िए। मोदी युग में आइए। मोदी अपने परिवार, यहां तक कि अपनी मां तक पर भी एक भी पैसा, सरकारी खजाने से खर्च नहीं करते। अपनी जेब से खर्च करते हैं। एक बार कुछ समय पहले मोदी की मां दिल्ली आईं और प्रधान मंत्री आवास में ठहरीं तो उन का सारा खर्च मोदी ने अपनी जेब से खर्च किया। इतना ही नहीं, और भी तमाम व्यक्तिगत खर्च मोदी अपनी जेब से ही खर्च करते हैं। कोई सुरक्षा, कोई चिकित्सा का खर्च मोदी के परिवारीजनों पर सरकारी खजाने से नहीं होता। यह बात तो आप मान लेंगे न ? लेकिन यह बात मोदी विरोधी भी क्या मान लेंगे ? मुझे शक है। लेकिन यह तथ्य है। ठीक वैसे ही नेहरू के बारे में जो तथ्य मैं ने लिखे हैं, तथ्य और सत्य हैं।

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नहीं जानते तो अब से जान लीजिए कि अंगरेजी के प्रकाशक तब भी और अब भी बहुत अच्छी रायल्टी देते हैं। आज तो भारत में ही बहुत से ऐसे लेखक हैं जो दस, बीस, पचास करोड़ रुपए से अधिक सालाना रायल्टी पाते हैं। नेहरू भी ऐसे ही लेखक थे। नेहरू की किताबें हिंदी में भी हैं जरूर लेकिन अनुवाद हैं। नेहरू हिंदी के नहीं, अंगरेजी के लेखक हैं। सुदामा पांडेय नहीं हैं वह। हिंदी लेखकों की दरिद्रता देख कर नेहरू की रायल्टी का अनुमान न ही लगाएं तो बेहतर।

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जैसे मदन मोहन मालवीय, जैसे महात्मा गांधी, जैसे अन्य कोई मौलिक लेखक लिखते हैं, नेहरू भी वैसे ही लिखते थे। डिसकवरी ऑफ इंडिया नेहरू ने जेल में रह कर लिखी थी। ठीक वैसे ही जैसे बेटी इंदिरा को तमाम चिट्ठियां। जो लेटर टू डाटर नाम से पुस्तक रुप में छपी हुई है। नेहरू ने नेशनल हेराल्ड जैसा अखबार भी अंग्रेजों के खिलाफ निकाला था। नेहरू न सिर्फ अच्छे लेखक हैं, बहुत अच्छे पत्रकार भी हैं। जैसे अटल बिहारी वाजपेयी बहुत अच्छे पत्रकार हैं, कवि हैं। जैसे अटल जी किसी से अपने लिए नहीं लिखवाते थे, नेहरू भी नहीं लिखवाते थे।

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लालकृष्ण आडवाणी भी बहुत अच्छे पत्रकार रहे हैं। कमलापति त्रिपाठी बहुत अच्छे पत्रकार और लेखक रहे हैं। नहीं जानते तो अब से जान लीजिए नरेंद्र मोदी भी गुजराती में बहुत अच्छी कविताएं लिखते हैं। किसी से लिखवाते नहीं , खुद लिखते हैं। हां , कुछ लोग होते हैं ऐसे भी कृतघ्न और पापी जो दूसरों से लिखवा कर अपने नाम से छपवाने की बेशर्मी करते रहते हैं। लेकिन नेहरू उन में शुमार नहीं। नेहरू को लेडी माउंटबेटन से प्रेम के लिए, कश्मीर पर गलत फैसले के लिए, चीन नीति के फेल्योर के लिए हम जरूर जानते हैं। लेकिन किसी से प्रेम करना अपराध नहीं होता। और दुनिया में ऐसा कौन नेता है, जिस से कुछ गलत फैसले न हुए हों। नेहरू भी उन में से एक हैं।

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हां, एक बात और। ख्वाजा अहमद अब्बास चापलूस नहीं, खुद्दार लेखकों में शुमार होते हैं। लेकिन क्या है कि जैसे इन दिनों लोग मोदी विरोध में बीमारी और पागलपन की हद तक चले गए हैं, ठीक वैसे ही आप लोग नेहरू विरोध में बीमारी और पागलपन की हद तक पहुंच गए हैं। बचिए इस बीमारी और पागलपन से। बाकी पागलपन तो यहां तक पसर गया है कि जे एन यू जहां पढ़ने और पढ़ाने वाले लोग अपने को देश का क्रीम मानने का इल्हाम पालते हैं और विवेकानंद की लगने वाली मूर्ति का अपमान कर बैठते हैं। क्या तो वह भगवाधारी हैं। फासिस्ट हैं। आदि-इत्यादि। जैसे कन्हैया कुमार , खालिद आदि का नारा भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशा अल्ला, जे एन यू पर कालिख मलने के लिए कम पड़ गया हो। कि विवेकानंद का अपमान भी जरूरी हो गया।

वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक दयानंद पाण्डेय की फेसबुक वाॅल से…….

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