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वर्तमान मानवीय जीवनशैली में नशा अपनी गहरी पैठ बना चुका है। नशे की कालिमा में किशोरवय से लेकर युवा और बुजुर्ग तक फंसे हुए हैं। नशे का सुरूर किस कदर लोगों में हावी है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पहले लोगों को खुशी के मौके, सफलता मिलने या मेहमान नवाजी में लजीज व्यंजनों व मिठाईयां पेश की जाती थी लेकिन मौजूदा समय में हर छोटी-बड़ी सफलताओं व खुशियों के मौके पर नशा की फरमाइश होती है। दोस्तों की पार्टी या विवाह आदि आयोजन शराब के बिना सूने हो चले हैं।

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नशे के लिए तंबाखू, बीड़ी, सिगरेट और शराब के अलावा कम खर्च में और सहज रूप से नशीली दवा सीरप और इंजेक्शन का उपयोग अधिक हो रहा है। जो दवा बीमारी से निजात दिलाने के लिए बनाई गई है उसका उपयोग अब युवाओं द्वारा नशे के लिए किया जा रहा है। मेडिकल स्टोर वाले अपने थोड़े से फायदे के लिए बिना डाक्टर की पर्ची देखे ही ये नशीली दवाएं अवैध रूप से बेंच रहे हैं। जबकि सरकार ने ऐसी दवाओं की खुली बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया है। युवकों में दिन-ब-दिन नशे को लेकर झुकाव बढ़ता जा रहा है। शराब, सिगरेट, गांजा के साथ अब नशे के लिए युवा नए-नए तरीके भी इजाद कर रहे हैं। दर्द और एलर्जी से राहत दिलाने के लिए बनाई गई दवाइयों को उपयोग युवा वर्ग नशे के लिए करने लगा है।

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घर में पकड़े जाने के टेंशन से बचने के लिए युवा वर्ग नशीली दवा का सेवन कर आफत मोल ले रहे हैं। जानकारों की मानें तो पेंटविंन इंजेक्शन लगाने के 30 सेकंड के अंदर उसे नशा हो जाता है। इसी तरह स्पाजमो प्राक्सीवान कैप्सूल और कोरेक्स सीरप का नशा शराब जैसे दूसरे नशे की तुलना में सस्ता पड़ता है। यह हर जगह मेडिकल स्टोर में आसानी से भी मिल जाते हैं। इसे खाते समय किसी से छिपने की जरूरत नहीं पड़ती। शराब की तरह मुंह से बदबू भी नहीं आती जिससे नशे के रूप में ऐसी दवा का उपयोग किया जाता है।

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सेंट्रल ड्रग स्टेंडर्ड आर्गेनाइजेशन के नये आदेशों में नींद की गोली और हैवी एंटीबायोटिक दवा के लिए एमबीबीएस डॉक्टर की पर्ची जरूरी हो गई है पर दवा विक्रेताओं द्वारा इसका पालन नहीं किया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों संचालित मेडिकल स्टोर्स की बात तो छोड़ो, शहरी क्षेत्र व जिला मुख्यालय में भी मेडिकल स्टोर्स में बिना पर्ची के दवा दी जा रही है। चिकित्सकों की माने तो पेंटविन इंजेक्शन तुरंत अपना असर दिखाता है, वोनफिक्स को सूंघने से नशा आ जाता है। कोरिक्स सिरप या अन्य नशीली दवाओं के सेवन से व्यक्ति के स्नायु तंत्र, किडनी, लीवर पर विपरीत प्रभाव पड़ता है जिससे पैरालिसिस होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

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बड़ों का अनुसरण बच्चे करते हैं। जिस तरह घर के रीति-रिवाज व संस्कार बच्चे अपने आप सीख जाते हैं ठीक उसी तरह यदि परिवार का कोई भी सदस्य किसी भी प्रकार का नशा कर रहे है तो उससे बच्चों में नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। बड़ों की नकल करते हुए बच्चे चोरी-छिपे उसका प्रयोग करना शुरू कर देते हैं जो धीरे-धीरे आदत बन जाती है। लोग अक्सर एक-दूसरे के प्रोत्साहन, उलाहना या एक्सीपेरीमेंट की कोशिश में नशे की गिरफ्त में आ जाते है। कई लोग घरेलू कलह से परेशान होकर सिरदर्द कम करने नशे का सहारा लेने लगते हैं।

वैज्ञानिकी अध्ययन में इस बात की भी पुष्टि की गई है कि नशा करने वाले पैरेट्स के बच्चों में अपने आप ही ऐसे जीन्स उत्पन्न हो जाते हैं जिससे वे नशे की ओर खिंच जाते हैं। नशे के दुष्परिणाम भी बेहद खतरनाक होते हैं। सबसे पहले परिवार में कलह का कारण बनता है, आपसी रिश्तों में खटास पैदा करता है, कई बार तो दंपत्तियों में संबंध विच्छेद का कारण भी नशा ही उभरकर सामने आता है। नशेड़ी व्यक्ति का काम-धंधा में मन नहीं लगता, तंगी के चलते लत पूरी करने चोरी, लूटपाट जैसे गैरकानूनी कार्यों में संलिप्त हो जाता है। पहले नशे करने और बाद में उपचार के नाम पर पैसों की बर्बादी होती है।

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पेंटविन इंजेक्शन, कोरेक्स सीरप और स्पाजमो प्राक्सीवान कैप्सूल का नशे के लिए उपयोग किया जा रहा है। नशे के ये सामान मेडिकल स्टोर में 2 रुपए से लेकर 15 रुपए में आसानी से मिल जाते हैं। स्पाजमो प्राक्सीवान कैप्सूल पेट दर्द से राहत की दवा है। इसकी कीमत 2 रुपए है। युवा एक साथ चार से पांच कैप्सूल खाकर इसका उपयोग नशे के लिए कर रहे हैं। इसके अलावा पेंटविन इंजेक्शन लगाकर भी युवा वर्ग नशा कर रहा है। दो रुपए के इंजेक्शन को दस रुपए में बिक्री कर मेडिकल स्टोर के संचालक चांदी काट रहे हैं। नशे के लिए युवा स्पाजमो प्राक्सीवान, एंटी एलर्जिक टेबलेट एविल, नारफिन एंपुल, नाइट्रोसीन टेबलेट, आयोडेक्स व कोरेक्स सीरप का भी उपयोग कर रहे हैं। इनमें से नारफिन व नाइट्रोसीन को तो प्रतिबंधित कर दिया गया है। फिर भी ये मेडिकल स्टोर्स में मिल जाते हैं। रेलवे स्टेशन व ट्रेनों में भटकने और कबाड़ बीनने वाले बच्चों को बोनफिक्स सूंघने की लत लग गई है। (साभार मप्रहिए)

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