प्रतीकात्मक फोटो
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सोशल मीडिया, मेन स्ट्रीम मीडिया, खासकर न्यूज चैनलों की अपेक्षा ज्यादा जिम्मेदार निकला। सोशल मीडिया जो इस बात के लिए बदनाम रहा है कि वह लंपट है, झूठ परोसने की मशीन है और भाषाई नग्नता का प्रतीक है उसने अपनी परिपक्वता अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के आए निर्णय को लेकर पुष्ट कर दी।

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बेशक, सुप्रीम कोर्ट का निर्णय 9 नवंबर 2019 को आया लेकिन सोशल मीडिया पर लोगों ने एकजुट होकर एक हफ्ते पहले ही अपनी भूमिका तय कर ली थी। सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्मस पर लोगों ने पुरजोर तरीके से आम जनता को शांति व सद्भाव के लिए प्रेरित करना व अपील करना आरंभ कर दिया था। सोशल मीडिया यानी हमारी-आपकी आवाज यानी लोक की आवाज यानी एक परिपक्व होते लोकतंत्र की आवाज के रूप में आप इसे देख या समझ सकते हैं।

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खास बात यह भी रही कि अल्पसंख्यक समुदाय के लोग भी सामने आए। मैंने फेसबुक, इंस्टाग्राम, वाट्सअप ग्रुपों व ट्वीटर पर सैकड़ों ऐसी पिक्चर्स देखीं जिसमें तमाम हिन्दू युवा अपने मुसलमान दोस्तों के साथ गलबहियां थे। मेरे एक पत्रकार साथी ने अयोध्या की एक पिक्चर डाली जिसमें एक टोपी वाले मौलाना एक हिंदू साधू के साथ मस्ती के मूड में थे। कुछ ऐसी पिक्चर्स भी नजर आईं जो हालांकि कुछ साल पुरानी थीं लेकिन आज के हालात में मौंजू थीं मसलन-एक मुस्लिम और एक साधु दोनों एक गली के चबूतरे पर बैठे- हम प्याला हम निवाला थे, एक और पिक्चर ने ध्यानाकृष्ट किया जिसमें बुर्के में एक मुस्लिम महिला अपने छोटे से बेटे को बाल कृष्ण के रूप में लेकर सड़क पर जा रही थी।

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..…ये पिक्चर्स और ये परिपक्वता मेरे मन में यह विश्वास पैदा कर रही है कि लोग फिरकापरस्ती और धर्म की घटिया राजनीति से अपने को दूर रखकर अलहदा सोचने लगे हैं। सोशल मीडिया के यदि इस रूप का आप अध्ययन करें तो सहज रूप से यह उन नेताओं, दलों, धर्म के धंधेबाजों और कट्टरवादियों के लिए खतरे की घंटी है जो इसे आधार बनाकर अपना उल्लू सीधा करते आए हैं।

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सोशल मीडिया स्वतंत्र है…. बिंदास है और उसके लब आजाद हैं….वह किसी अडानी, किसी अंबानी, एबीसीडी, किसी आर….. का गुलाम नहीं है….उसे किसी सरकारी विज्ञापन की दरकार नहीं है, सोशल मीडिया पर लिखने वाले तमाम पत्रकारों के लिए या जन सामान्य टिप्पणीकारों का न तो सूचना सलाहकार बनने, राज्यसभा जाने, किसी विभाग का चेयरमैन बनने या एमएलए और एमएलसी बनने का कोई लालच या स्कोप है…. इसलिए वह मुखर है और बेबाक है।

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दरअसल, अब सरकारें इसी सोशल मीडिया से हलकान हैं क्योंकि खरीदें हुए न्यूज चैनल्स और बड़े प्रिंट मीडिया की हर खबर को सोशल मीडिया प्याज की तरह छील देता है। सोशल मीडिया पर यह साफ हो जाता है कि सरकारें किस खबर में कहां कितना झोल कर रही हैं। तमाम खरीदे हुए पत्रकारों के तमाम वीडियो क्लिप्स उन्हें और उनके तथाकथित ज्ञान व सरकारी समर्पण को सामने रख देती हैं। सच पूछिए तो न्यूज चैनलों को सोशल मीडिया ने एकदम नंगा कर दिया है।

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बेहतर होता अगर अयोध्या मंदिर के फैंसले पर न्यूज चैनल केवल न्यायालय के फैंसले तक ही सीमित रहते। लोगों की प्रतिक्रिया दिखाने व इस पर बेहूदा टाक-शो करने से बचते। प्रख्यात साहित्यकार व पत्रकार मरहूम मनोहर श्याम जोशी जी यूं हीं न्यूज चैनल्स के कारिंदो को ‘दुल्लती मारता बछड़ा’ नहीं कहते थे….

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फिलहाल, सोशल मीडिया पर सक्रिय परिपक्व भारतीय जनमानस के मनीषियों को सादर साधुवाद कि उन्होंने चैनलों से ज्यादा देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी व प्रतिबद्धता दिखाई। सोशल मीडिया को टीआरपी की कभी जरूरत नहीं पड़ती….खुलकर लिखो दोस्तों…. जिम्मेदारी के साथ लिखो…. क्योंकि यह देश आपका है….जय हिन्द।। जय भारत।।

वरिष्ठ पत्रकार पवन सिंह की फेसबुक वाॅल से……

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