हनुमान गढ़ी अयोध्या [फाइल फोटो]
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देश-दुनिया में चर्चित अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद पर फैसला जल्द आने की उम्मीद है। 07 अक्टूबर, 1984 को अयोध्या के सरयू तट पर लाखों रामभक्तों की उपस्थित में पूज्य संतों ने जो संकल्प लिया था, वह पूरा होने को है।

सर्वविदित है कि रामलला के भव्य मंदिर को तोड़कर आक्रांता बाबर के सेनापति मीरबाकी ने मस्जिद बनाई, जिसे मुक्त करने के लिए हिंदू समाज ने 76 लड़ाइयां लड़ीं। चार लाख की संख्या में हिन्दू वीरों ने बलिदान दिए। 1984 से अब तक विश्व हिन्दू परिषद ने संतों की अगुवाई में रामजन्म भूमि के लिए कई आन्दोलन किये। विहिप ने राममंदिर के लिए जागरण के महाभियान के साथ साथ कानूनी लड़ाई भी जारी रखी। जिसका पटाक्षेप होने वाला है। लेकिन अयोध्या आन्दोलन में 02 नवम्बर 1990 की घटना को नजरंदाज नहीं किया जा सकता जब तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने निहत्थे कारसेवकों पर गोलियों की बौछार करवाई थी।

Ayodhya, India – November 17, 2017: Entrance of the Holy city the birthplace of Lord Rama the Ayodhya.

अयोध्या में 30 अक्टूबर 1990 को श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन के लिए पहली कारसेवा हुई थी। प्रदेश सरकार की बंदिशों के बावजूद लाखों कारसेवक 30 अक्टूबर से 02 नवम्बर के बीच अयोध्या पहुंच गये थे। इससे पहले उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने दंभ भरी वाणी में कहा था कि अयोध्या में परिन्दा ‘पर’ भी नहीं मार सकता। लाखों भक्तों के अयोध्या पहुंचने से मुलायम सिंह के बयान की हवा निकल गई जिससे वह तिलमिला उठे। प्रशासन ने अयोध्या में कर्फ्यू लगा रखा था, इसके चलते अयोध्या में बाहरी लोगों को प्रवेश नहीं दिया जा रहा था। पुलिस ने विवादित क्षेत्र के डेढ़ किलोमीटर के दायरे में बैरिकेडिंग कर रखी थी। एक दिन पहले तक जहां अयोध्या में सन्नाटा पसरा था दूसरे दिन अचानक लाखों रामभक्त पहुंच गये।

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कारसेवकों की भीड़ बेकाबू हो गई थी। पहली बार 30 अक्टबूर, 1990 को कारसेवकों पर चली गोलियों में पांच लोगों की मौत हुई थीं। इस घटना के बाद अयोध्या से लेकर देश का माहौल पूरी तरह से गरमा गया। इस गोलीकांड के दो दिन बाद ही 02 नवम्बर को हजारों कारसेवक हनुमान गढ़ी के करीब पहुंच गए थे। उमा भारती, अशोक सिंघल जैसे बड़े हिन्दूवादी नेता कारसेवकों का नेतृत्व कर रहे थे। ये नेता अलग-अलग दिशाओं से कारसेवकों के जत्थे के साथ हनुमान गढ़ी की ओर बढ़ रहे थे। प्रशासन उन्हें रोकने की कोशिश कर रहा था, लेकिन 30 अक्टूबर को मारे गए कारसेवकों के चलते रामभक्त गुस्से से भरे थे। आसपास मंदिरों की छतों पर बंदूकधारी पुलिसकर्मी तैनात थे और किसी को भी रामजन्मभूमि तक जाने की इजाजत नहीं थी।

02 नवम्बर को सुबह का वक्त था। नवम्बर की सुबह वैसे सर्द रहती है लेकिन 02 नवम्बर की सुबह कारसेवकों के जोश से गर्म थी। प्रशासन की कड़ाई के कारण खून की प्यासी मुलायम की पुलिस ने रामजन्मभूमि को घेर रखा था। कारसेवक वहां तक पहुंचने की जिद पर अड़े थे। अयोध्या के हनुमान गढ़ी के सामने लाल कोठी की संकरी गली में कारसेवक बढ़े चले आ रहे थे। पुलिस ने सामने से आ रहे कारसेवकों पर फायरिंग कर दी, जिसमें सरकारी आंकड़ों के मुताबिक करीब डेढ़ दर्जन कारसेवकों की मौत हो गई। इस दौरान ही कोलकाता से आए कोठारी बंधुओं की भी मौत हुई थी। आज भी 02 नवम्बर 1990 की काली यादें ताजा हैं। दोनों सगे भाई थे। दोनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक थे। एक संघ का मण्डल कार्यवाह था और दूसरा भाई शाखा का मुख्य शिक्षक था।

इस प्रकार कह सकते हैं कि विहिप द्वारा शुरू किये गये राम मंदिर आन्दोलन में पहली आहुति देने वाले संघ के स्वयंसेवक ही थे। कारसेवकों ने अयोध्या में मारे गए कारसेवकों के शवों के साथ प्रदर्शन भी किया। आखिरकार 04 नवम्बर को कारसेवकों का अंतिम संस्कार किया गया और उनके अंतिम संस्कार के बाद उनकी राख देश के अलग-अलग हिस्सों में ले जाया गया।

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1990 के गोलीकांड के बाद हुए विधानसभा चुनाव में मुलायम सिंह बुरी तरह चुनाव हार गए और कल्याण सिंह सूबे के नए मुख्यमंत्री बने। तब मुलायम को ‘मुल्ला मुलायम’ तक कहा जाने लगा क्योंकि उन्होंने कारसेवकों पर गोली चलाने के आदेश दिए थे। मुलायम के इस कृत्य के लिए उन्हें क्षमा नहीं किया जा सकता। रामभक्तों पर गोली चलवाकर उन्होंने भले ही मुस्लिमों का दिल जीत लिया हो लेकिन हिन्दू समाज का विश्वास उन्होंने तोड़ने का काम किया। वह भी ऐसे समय में जब देशभर में रामलहर थी ऐसे समय में रामभक्तों पर गोली चलवाने का काम मुलायम सिंह जैसा राजनीतिज्ञ कर बैठे तो इसे मतिभ्रम ही कहेंगे।

इस बार 30 अक्टूबर 2019 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जो हिन्दुत्व के चेहरा माने जाते है। मुलायम सिंह से मिलने उनके आवास पर गये थे। भले ही यह राजनीतिक शिष्टाचार मुलाकात थी लेकिन इससे जख्म ताजा जरूर हुआ है क्योंकि 30 अक्टूबर 1990 और 02 नवम्बर 1990 को अयोध्या में मुलायम सिंह ने गोली चलवाई थी। मुलायम सिंह ने भले ही इस घटना के लिए माफी मांगी हो लेकिन किसी ने ठीक ही कहा है कि कुछ पाप भूले नहीं जा सकते और उनके दाग धुले नहीं जा सकते।

अयोध्या में कुछ इसी तरह की स्थिति 09 नवम्बर 1989 को भी उत्नन्न हुई थी। लेकिन तत्कालीन केन्द्र व प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने स्थिति की गंभीरता को समझकर बीच का रास्ता निकाला था और संतों द्वारा नियत स्थान पर शिलान्यास करने की अनुमति दे दी थी। अयोध्या में 09 नवम्बर 1989 को लाखों कारसेवक जुटे थे। 10 हजार से अधिक रामभक्त प्राण देने के लिए संकल्पबद्ध थे। इससे परेशान प्रशासन के हाथ-पांव फूल गये। लखनऊ से गोरखपुर फोन किया गया कि महंत अवैद्यनाथ से मुख्यमंत्री बात करना चाहते हैं। स्थिति गंभीर है। राजकीय विमान भेजा जा रहा है। उन्हें तत्काल लखनऊ लाने के लिए राजकीय विमान गोरखपुर भेजा गया।

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गोरखपुर के जिलाधिकारी महंत अवैद्यनाथ को लेकर विमान से चालीस मिनट में लखनऊ पहुंचे। हवाई अड्डे से सीधे उन्हें मुख्यमंत्री निवास पर ले जाया गया। वहां तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। वार्ता प्रारम्भ हुई। मुख्यमंत्री बोले महंत जी जिस स्थान पर आप शिलान्यास करने जा रहे हैं, उच्च न्यायालय ने उसे विवादित घोषित कर दिया है। वहां से हटकर आप किसी और स्थान पर अपना कार्यक्रम कर लें। महंत जी ने कहा कि हमें यह निर्णय स्वीकार नहीं है। हमने 02 नवम्बर को जहां पर सोच विचार कर झंडा गाड़ा है, हम शिलान्यास वहीं करेंगे। वह प्रस्तावित मंदिर के सिंह द्वार का मध्य बिन्दु है। यदि आप शिलान्यास में बाधा डालेंगे तो हम सत्याग्रह करेंगे। सत्याग्रह करने की तैयारी के साथ रामभक्त अयोध्या पहुंचे हैं।

महंत जी के दृढ़ निश्चय के आगे नारायण दत्त तिवारी हिल गये। बाद में राज्य की गृहमंत्री सुशीला रोहतगी पहुंची, किन्तु बात नहीं बनी। मुख्यमंत्री ने दिल्ली से संपर्क साधा और तत्कालीन गृहमंत्री बूटा सिंह को बताया कि आप तुरन्त आएं क्योंकि महंत जी मान नहीं रहे हैं। बूटा सिंह तत्काल विमान से लखनऊ पहुंचे। महंत जी से वार्ता हुई कि चुनाव का समय है। स्थिति बिगड़ जायेगी। न्यायालय का निर्णय आपको मान लेना चाहिए। भूखण्ड संख्या 586 के बाहर आप अपना कार्यक्रम कर लें अन्यथा न्यायालय की अवमानना होगी।

महंत अवैद्यनाथ ने कहा कि आज की स्थिति के लिए आप और आपकी सरकार दोषी है। शिलान्यास कार्यक्रम की घोषणा हमने चुनाव को ध्यान में रखकर नहीं की है। आपने चुनाव की घोषणा कर शिलान्यास कार्यक्रम को चुनाव के बीच फंसा दिया। आप राम मंदिर बनाने के लिए हिन्दुओं को तो रोकते हैं लेकिन अब्दुल्ला बुखारी और दूसरे मुस्लिम नेताओं के पास जाकर उनकी खुशामद करते हैं।

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महंत जी ने कहा कि यह राष्ट्रीय अस्मिता का प्रश्न है इसलिए हम शिलान्यास नियत स्थान पर ही करेंगे। यदि आप न्यायालय की अवमानना का प्रश्न उठाकर हमें डराना चाहते हैं तो हम डरने वाले नहीं हैं। आप यहीं पर हमें गिरफ्तार कर लें या फिर अयोध्या जाकर न्यायालय की अवमानना करके हमें गिरफ्तारी देने दें। शिलान्यास तो होगा और 09 नवम्बर को ही होगा। गृहमंत्री बूटा सिंह लाचार हो गये। उन्होंने मुख्यमंत्री, राज्य के गृहमंत्री, राज्य के मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक गुप्तचर विभाग, केन्द्रीय गृह मंत्रालय के सचिव और राज्य के महाधिवक्ता से विचार विमर्श किया। जन्मभूमि का मानचित्र मंगाया गया। नाप-जोख का नाटक किया गया। महाधिवक्ता ने केन्द्रीय गृहमंत्री बूटा सिंह, मुख्य मंत्री नारायण दत्त तिवारी के सामने बताया कि महंत जी नाप-जोख में गलती हुई थी। जिस स्थान पर आप शिलान्यास करने वाले हैं वह स्थान विवादित भूखण्ड संख्या 586 की सीमा के बाहर है। आप वहां शिलान्यास कर सकते हैं।

महंत जी ने कहा कि आप जिन भूखण्डों को विवादित मान रहे हैं। हम उन्हें भी विवादित नहीं मानते। वहां के सभी भूखण्ड श्रीराम जन्मस्थान के हैं। यह हमारा संकल्प है। महंत जी राजकीय विमान से अयोध्या आये। लखनऊ से अयोध्या के प्रशासन को सूचना मिली कि शिलान्यास हेतु निश्चित किया गया स्थान विवादित सीमा के बाहर है। शिलान्यास होने दो।

10 नवम्बर 1989 को रामभक्तों की संकल्प शक्ति के सामने तत्कालीन केन्द्र व प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने अयोध्या में श्रीराम मंदिर का शिलान्यास करने की अनुमति दे दी। वह भी उस स्थान पर जिसे संतों ने तय किया था। अयोध्या में व्याप्त तनाव समाप्त हो गया। अयोध्या में जय श्रीराम का स्वर गूंज उठा। साधु संतों के नेतृत्व में हरिजन बंधु कामेश्वर चौपाल के हाथों मंदिर के शिलान्यास की पहली ईंट रखवाई गयी।


संघ के तत्कालीन सर कार्यवाह हो.वे. शेषाद्रि, राजमाता विजयाराजे सिंधिया, महंत परमहंस दास और अशोक सिंहल की उपस्थिति में शिलान्यास संपन्न हुआ। इसके बाद 06 दिसम्बर 1992 को विहिप ने कारसेवा की घोषणा की। कारसेवकों में तत्कालीन केन्द्र और राज्य सरकार के खिलाफ भारी आक्रोश था। यह आक्रोश उस बाबरी ढांचे के खिलाफ था, जो गुलामी का प्रतीक था।

Supporters of the Temple at the Supreme Court in New Delhi , where the heairng in the Ayodhya Babri case was underway on thursday. Express Photo by Tashi Tobgyal New Delhi 100119

रामभक्त उसे किसी भी हालत में देखना नहीं चाहते थे। 06 दिसंबर, 1992 को रामभक्त कारसेवकों द्वारा ढहा दिया गया। ढ़ांचा हटने के बाद भूमि पर स्वामित्व का विवाद जो पहले से चल रहा था रामसखा की ओर से पैरवी शुरू हुई। जिसके परिणाम स्वरूप इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 30 सितंबर, 2010 को इस मामले में फैसला सुनाते हुए विवादित जमीन को तीन भागों में बांटने का आदेश दिया था। एक हिस्सा रामलला विराजमान, दूसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़ा और तीसरा हिस्सा मुस्लिम पक्ष को दिया था।

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रामलला विराजमान को वही हिस्सा दिया गया था, जहां रामलला विराजमान हैं। इस फैसले के खिलाफ सभी पक्षों ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील दाखिल की थी। कुल 14 अपीलें हुईं। सर्वोच्च न्यायालय ने अपील स्वीकार करते हुए मामले में यथास्थिति कायम रखने का आदेश दिया था। 2010 से लंबित मामले में सर्वोच्च न्यायालय की पांच न्यायाधीशों की पीठ ने गत छरू अगस्त से रोजाना नियमित सुनवाई शुरू की थी जो अक्टूबर में पूरी हो गयी।

अब फैसला जल्द आने की उम्मीद है क्योंकि 17 नवंबर को मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई सेवानिवृत्त हो रहे हैं। सभी पक्ष अपने-अपने हक में निर्णय आने के बयान दे रहे हैं, लेकिन अभी से कुछ कहना ठीक नहीं है। निर्णय जो भी आए उसे सभी पक्षों को स्वीकार करना चाहिए। अगर कोर्ट इस बार भी निर्णय नहीं सुनाती है तो एकमेव मार्ग शेष बचता है कि सरकार संसद में कानून बनाये और राम मंदिर का निर्माण कराये। लेकिन अगर संसद में कानून बनाना पड़ा तो कानून केवल अयोध्या के लिए ही नहीं बल्कि अयोध्या,मथुरा और काशी की मुक्ति के लिए भी बनेगा।

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