कश्मीर की डल झील में यूरोपियन सांसद {फाइल फोटो}
4 min read

मोदी सरकार की कश्मीर नीति पर यूरोपियन संासदों मुहर लगाने का काम किया है। यूरोपियन सांसदों से मीडिया से मुखतिब होकर हर सवाल का तसल्ली से जवाब दिया। इन सांसदों के दौरे से दुनियाभर में उन शक्तियों का इकबाल कम होगा जो कश्मीर को लेकर मानवाधिकार का रोना रो रहे थे। कश्मीर मसले के बारे में भारत का शुरू से ही यही स्टैण्ड रहा है कि ये आंतरिक मामला है, ऐसे में तीसरे पक्ष की भूमिका का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ यूरोपियन सांसद [फोटो पीएम ट्विट]

कश्मीर से धारा 370 हटाने के बाद से ही पाकिस्तान बौखलाया हुआ है। उसे कश्मीर रूपी अपनी वो दुकान बंद होती दिख रही है जिसकी दुहाई देकर वो दुनियाभर से जकात बटोरा करता था। वहीं भारत में आंतकियों को छिपाने का सुरक्षित ठिकाना भी खत्म होता दिख रहा है। इसलिए जितना हो सका पाकिस्तान ने इस मसले पर रोना-गाना किया। उसने दुनिया भर के देशों से मदद मांगी, लेकिन हर जगह उसे भीख के कटोरे में बेइज्जती के सिक्के ही मिले। भारत ने कुशल कूटनीति और विदेशनीति की बदौलत कश्मीर मुद्दे के साथ ही साथ आंतकवाद के मुद्दे पर भी विश्व बिरादरी का समर्थन हासिल किया।

यह भी पढ़ें :  कोसने के लिए मोदी और अमेजन हैं ही…

यूरोपियन यूनियन के सासंदों के कश्मीर दौरे पर विपक्ष के दलों ने एतराज जाहिर किया। कांग्रेस ने सरकार पर पक्षपात का आरोप लगाया तो वहीं एमआईएम के मुखिया ओवैसी ने तो यूरोपियन यूनियन के सासंदों को नाजी ही घोषित कर डाला। विपक्ष के साथ भाजपा के राज्यसभा सांसद डॉ.सुब्रमण्यम स्वामी ने भी इस पर सवाल उठाया है। मुख्य आपत्ति इस बात पर है कि भारतीय सांसदों को वहां जाने से रोकने के बाद विदेशी सांसदों को घाटी में ले जाए जाने से गलत सन्देश गया है। इसे भारतीय संसद का अपमान भी बताया जा रहा है। विपक्ष का तर्क है कि जब भारतीय सांसदों को कश्मीर में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जा रही है तो विदेशी सांसदों को वहां भेजने का क्या अर्थ है ? वैसे यह बात भी सामने आ रही है कि अगर सरकार मानती है कि वहां हालात सुधर गए हैं तो सबसे पहले देश की संसद के प्रतिनिधियों को हालात का जायजा लेने देना चाहिए था।

यह भी पढ़ें : जस्टिस शरद अरविंद बोबडे होंगे नए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया, 18 नवंबर को लेंगे शपथ

यूरोपियन यूनियन के सांसदों ने कश्मीर यात्रा के बाद जो कुछ भी मीडिया या सार्वजनिक मंच से कहा वो सब मोदी सरकार के पक्ष में गया। सांसदों ने कहा कि कश्मीर में मोदी सरकार सही दिशा में आगे बढ़ रही है। यूरोपियन सांसदों के दौरे से न केवल विपक्ष के दल और नेता बेचैन और नाराज हैं। बल्कि पाकिस्तान के पेट में भी इस दौरे का दर्द तेजी से उठा। सांसदों के दौरे को प्रभावित करने के लिए आंतकियों ने कुलगाम में सोये हुए पांच मजदूरों को जगाकर गोली मारने जैसे कायरता पूर्ण कारनामे को अंजाम दिया। सुरक्षा बलों पर हमले के साथ ही सेब लाने के लिए गए ट्रक ड्राइवरों की हत्या जैसे कदमों से दहशत फैलाने का प्रयास भी किया जा रहा है। सरकार ने घाटी के सेब उत्पादकों को आर्थिक सहायता देने के लिए सरकार ने उनकी खरीदी भी की। लेकिन सेब की पेटियों को देश के दूसरे हिस्सों में भेजने के लिए आये ट्रकों के ड्राइवरों की हत्या के बाद से ट्रक वाले घाटी के भीतरी हिस्सों में घुसने से डरने लगे।

यह भी पढ़ें :   जेवर बनवाई के नाम पर ग्राहकों को बेवकूफ बनाया जा रहा

यूरोपियन सांसदों के दौरे पर विपक्ष की आपत्ति के बीच सरकार की ओर चुप्पी का माहौल है। लेकिन जानकारों के मुताबिक विदेश मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार इस यात्रा के जरिये भारत ने पश्चिमी ताकतों को विश्वास में लेकर पाकिस्तान को पूरी तरह अलग-थलग करने का दांव चला है। जिसके बाद इमरान खान पर भी ये दबाव बन गया है कि वे अपने कब्जे वाले कश्मीर में भी विदेशी सांसदों को हालात का जायजा लेने की सुविधा प्रदान करें। सरकार की तरफ से ये भी कहा जा रहा है कि राहुल गांधी के साथ गए विपक्षी सांसदों को जब कश्मीर में जाने से रोका गया उस समय तक वहां हालात असमान्य थे और पर्यटकों तक पर प्रतिबंध लगा था। लेकिन मोबाइल सेवा बहाल किये जाने और पर्यटकों के लिए घाटी के दरवाजे खोले जाते ही वहां आना-जाना शुरू हो चुका है। यहां यह दीगर है कि कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद को घाटी में जाने की अनुमति सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गयी थी। सीपीएम नेता सीताराम येचुरी भी वहां हो आये थे।

यह भी पढ़ें :  डेंगू के डंक से बीमार पटना

यूरोपयिन यूनियन के सांसदों का दौरा एक एनजीओ के मार्फत आयोजित हुआ। इसे लेकर भी तरह-तहर की चर्चाएं हो रही हैं। कहा जा रहा है कि सरकार ने बैक डोर से ये यात्रा आयोजित करवाई है। केन्द्र की मोदी सरकार इसे कूटनीतिक हितों की खातिर उठाया कदम बताकर उसकी सार्थकता साबित कर रही है। गौरतलब है कि घाटी में फोन व अन्य संचार सुविधाएं बहाल हो जाने के बाद जनता की तरफ से तो किसी भी प्रकार की उग्र प्रतिक्रिया तो सामने नहीं आई लेकिन दो महीने से भी ज्यादा से बिल में छिपे आतंकवादी जरुर बाहर निकलकर अपनी कारस्तानी दिखाने लगे हैं।

यह भी पढ़ें : वीर सावरकर को ‘भारत रत्न’ मिलना चाहिए!

यूरोपियन यूनियन के सांसदों को आमंत्रित करने के पीछे सरकार की मंशा बिल्कुल ठीक हो तब भी इस कवायद से कश्मीर पर बना भ्रम शायद ही साफ हो पाएगा। केंद्र सरकार को चाहिए कि वह विपक्षी सांसदों के दल को भी कश्मीर घाटी का अवलोकन करने का आमंत्रण दे जिससे उनके मन में व्याप्त असंतोष दूर हो सके। यूरोपियन यूनियन के सांसदों ने जो कुछ कश्मीर में देखा, उसका संदेश अब सारी दुनिया में जाएगा। कश्मीर में पिछले कई दशकों से जो हालात बने हुए है, वो एक दो महीने में सुधरने वाले नहीं हैं। यूरोपियन यूनियन के सांसदों का यह दौरा आने वाले समय में मील का पत्थर साबित होगा।

अपनी राय हमें contact@yugsakshi.com के जरिये भेजें। फेसबुकट्विटर और यूट्यूब पर हमसे जुड़ें।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति युगसाक्षी डॉट कॉम उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार युगसाक्षी डॉट कॉम के नहीं हैं, तथा युगसाक्षी डॉट कॉम उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here