प्रतीकात्मक फोटो।
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नोटबंदी, जीएसटी और फिर उसके बाद आर्थिक मंदी। इसका असर स्थानीय सराफा बाजार पर भी पड़ा है। धनतेरस एवं दीपावली सिर पर है। इसके बाद भी मार्केट में ज्यादा रौनक नहीं है। यही वजह है कि तरह-तरह का ऑफर दिया जा रहा है। इनमें एक बनवाई में छूट भी है। इससे पहले बनवाई कोई बहुत बड़ा मुद्दा नहीं रहा किन्तु अब यह ग्राहक खींचने का चुम्बक बन गया है। कोई जीरो प्रतिशत बनवाई का दावा कर रहा है तो किसी का ऑफर मुफ्त बनवाई या फ्री बनवाई है।

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जेवर में प्रति ग्राम सोने के हिसाब से बनवाई ली जाती है। अधिकांश दुकानदार या तो खुद का कारीगर रखते हैं या फिर किसी बाहरी को रखा जाता है। आर्डर पर जेवर बनवाने के लिए बनवाई अब ली जाने लगी है। इसका कोई विशेष फार्मूला या रेट फिक्स नहीं होता। यह भी नहीं है कि सोने एवं चांदी के जेवर में पूरा सराफा बाजार एक साथ दाम लगाता हो।

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हर दुकानदार के अपने अपने रेट हैं। कोई तीन सौ कोई चार सौ या कोई उससे भी ज्यादा प्रति ग्राम बनवाई लेता है। ज्वेलरी की डिजाइन पर भी इसका रेट आधारित होता है। कठिन या कोई खास डिजाइन पर ज्यादा पैसे लगते हैं। चूंकि सराफा एक संगठित व्यापार है इसीलिए बनवाई का मायाजाल उपभोक्ता की जेब खाली कर रहा है।

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जागरुकता की कमी होने के कारण भी बनवाई का कोई नियम, कानून नहीं बन पा रहा। कमाई तो है तभी तो बनवाई में छूट देकर ग्राहक ललचाये जा रहे हैं। बिना रसीद हॉलमार्क रहित जेवर की बनवाई कम ली जाती है किन्तु हॉलमार्क आभूषण में बनवाई के नाम पर ग्राहक से जमकर दाम वसूले जाते हैं। यानि अशुद्धता सस्ती और शुद्धता महंगी।

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यूं तो स्वर्ण आभूषण का समूचा व्यवसाय विश्वास पर चला आ रहा है परन्तु शहरों के विस्तार से अब देश के हर छोटे बड़े शहर में के ज्वेलरी के बड़े-बड़े शोरूम खुल गए हैं जिनके साथ खरीददारों का पहले जैसा पुश्तैनी संबंध नहीं है। आजकल ब्राण्डेड ज्वेलरी भी खूब बिक रही है।

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तनिष्क, भीमजी जवेरी तथा पीपी ज्वेलर्स जैसे बड़े ब्राण्ड में स्थानीय स्तर पर आ गये हैं। लेकिन बनवाई के नाम पर ग्राहकों को जिस तरह से बेवकूफ बनाया जा रहा है उस तरफ शासन प्रशासन का कोई ध्यान नहीं है। दूध और मिठाई के साथ ही प्रशासन को ये भी देखना चाहिए कि सोने-चांदी के जेवरों की शुद्धता और बनवाई में किस तरह बेईमानी हो रही है। (साभार मप्र.हि.ए.)

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