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संघर्षों की आग में तपकर देश और समाज के सामने आदर्श बन जाने वाले प्रेरणास्रोत थे लोकनायक जयप्रकाश नारायण। जयप्रकाश जी जिन्हें देशवासी जेपी के नाम से भी जानते हैं। उनका व्यक्तित्व ऐसा था कि सक्रिय राजनीति से दूर रहने के बाद वे 1974 में ‘सिंहासन खाली करो जनता आती है’ के नारे के साथ वे मैदान में उतरे तो सारा देश उनके पीछे चल पड़ा। स्वतंत्रता संग्राम में जयप्रकाश नारायण के योगदानों के बारे में जितना कहा जाए वह कम है। वह विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। आज लोकनायक के नाम से जाने जाने वाले जयप्रकाश नारायण की 117वीं जयंती है।

जयप्रकाश जी का जन्म 11 अक्टूबर 1902 को बिहार के सारण जिले के सिताबदियारा गांव में हुआ। इनके पिता का नाम देवकी बाबू और माता का नाम फूलरानी देवी था। गांव में कोई हाई स्कूल न होने की स्थिति में जेपी पढ़ाई के लिए पटना आ गए। 1919 में गांधीजी के असहयोग आन्दोलन से जयप्रकाश जी का जुड़ाव हुआ। उन पर मौलाना अबुल कलाम आजाद के भाषण का गहरा प्रभाव पड़ा। जिसमें उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा की खिलाफत की बात कही थी। इस बात के प्रभाव में आकर जयप्रकाश जीे उस समय काॅलेज छोड़ दिया। पटना काॅलेज छोड़कर उन्होंने कांग्रेस द्वारा संचालित बिहार विद्यापीठ में प्रवेश लिया। लेकिन चैरा-चैरी आन्दोलन के हिंसक हो जाने के कारण उसे रोक दिया गया और विद्यापीठ भी छिन्न-भिन्न हो गया।

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जयप्रकाश जी ने समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर करने के बाद अमेरिकी विश्वविद्यालय में आठ वर्ष तक अध्ययन किया जहां वह माक्र्सवादी दर्शन से गहरे प्रभावित हुए। लेकिन वह अपनी डाक्टरेट पूरी नहीं कर सके और नवम्बर 1929 में उन्हें अपनी मां की बीमारी की खबर पाकर वापस भारत आना पड़ा। 1930 में जब बहुत से कांग्रेसी नेता गिरफ्तार किए जा रहे थे, तब जयप्रकाश नारायण ने भूमिगत होकर कांग्रेस वर्किंग कमेटी का कामकाज जारी रखा। उस समय सभी गुप्त मीटिंग तथा कांग्रेस वर्किंग कमेटी का कामकाज जयप्रकाश जी के गुप्त अड्डे से होता था, लेकिन एक बार ऐसे ही बनारस में एक मीटिंग के दौरान जयप्रकाश नारायण गिरफ्तार हो गए और उन्हें 1933 तक जेल में रहना पड़ा।

जेपी ने कई-कई बार जेल की सजा भोगी क्योंकि वह ब्रिटिश सरकार को उखाड़ फेंकने के काम में लगे हुए थे। एक बार जेल से भागकर नेपाल चले गए जहां उन्होंने ‘आजाद दस्ता’ के नाम से एक गोरिल्ला फौज का गठन किया लेकिन ब्रिटिश सरकार ने इन्हें पकड़ ही लिया। जयप्रकाश जी सोलह महीनों तक लाहौर के किले में बन्द रहे और एकाकी कैद के साथ-साथ बहुत सी शारीरिक तथा मानसिक प्रताड़ना झेलते रहे। गांधी जी के ‘करो या मरो’ के नारे को उन्होंने हमेशा याद रखा। इन्हीं लोगों के अथक प्रयास के बाद 15 अगस्त 1947 को हम आजाद हो गए। लेकिन जयप्रकाश जी की मुख्य भूमिका इसके बाद शुरू होती है।

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भारत की आजादी के बाद 1952 के चुनाव में समाजवादी पार्टी को कांग्रेस के आगे हार का मुंह देखना पड़ा लेकिन नेहरूजी ने जयप्रकाश जी को मंत्रिमण्डल में आने का अवसर दिया। यह जयप्रकाश जी के लिए एक महत्त्वपूर्ण अवसर था लेकिन जयप्रकाश जी के पास उनका एक चैदहसूत्री कार्यक्रम था जिसमें संविधान में सुधार, प्रशासन तथा न्याय व्यवस्था में सुधार, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, भूमिहीनों को जमीन देने का प्रस्ताव था। जवाहरलाल नेहरू इन प्रस्तावों को लागू करने की दिशा में कोई ठोस उत्तर देने के पक्ष में नहीं दिखे, तो जयप्रकाश जी ने मंत्रिमंडल में जाने से इंकार कर दिया।

जयप्रकाश जी सरकार, मंत्रिमंडल तथा संसद का हिस्सा नहीं रहे, लेकिन उनकी राजनैतिक सक्रियता बराबर बनी रही। इन्होंने ट्रेड यूनियन के अधिकारों के लिए संघर्ष किया तथा यह कामगारों के लिए न्यूनतम वेतन, पेंशन, चिकित्सा-सुविधा तथा घर बनाने के लिए सहायता जैसे जरूरी मुद्दे लागू कराने में सफल हुए।

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19 अप्रैल 1954 को जयप्रकाश जी ने अपना जीवन विनोबा भावे के सर्वोदय आन्दोलन को अर्पित करते हुए हजारीबाग में अपना आश्रम स्थापित किया। यहां जयप्रकाश जी ने गांधी जी के जीवन-दर्शन को आधुनिक पाश्चात्य लोकतन्त्र के सिद्धान्त से जोड़ दिया। इसी विचार की उनकी पुस्तक ‘रिकंस्ट्रक्शन ऑफ इण्डियन पाॅलिसी’ प्रकाशित हुई। इस पुस्तक ने जयप्रकाश को मैग्सेसे पुरस्कार के लिए चुने जाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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जयप्रकाश नारायण को 1970 में इंदिरा गांधी के विरुद्ध विपक्ष का नेतृत्व करने के लिए जाना जाता है। इंदिरा गांधी को पदच्युत करने के लिए उन्होंने ‘सम्पूर्ण क्रांति’ नामक आंदोलन चलाया। 1971 के वर्ष में जयप्रकाश नारायण ने नक्सली समस्या का समाधान निकाल कर तथा चम्बल में डाकुओं के आत्मसमर्पण में अगुवा की भूमिका निभाई। 1974 में देश बेहद मंहगाई, बेरोजगारी तथा जरूरी सामग्री के अभाव से गुजर रहा था। इसके विरोध में जयप्रकाश नारायण ने एक मौन जुलूस का आयोजन किया जिस पर लाठी चार्ज किया गया।

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‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। 5 जून 1975 की विशाल सभा में जेपी ने पहली बार ‘सम्पूर्ण क्रांति’ के दो शब्दों का उच्चारण किया था। यह क्रांति उन्होंने बिहार और भारत में फैले भ्रष्टाचार की वजह से शुरू की। लेकिन बिहार में लगी चिंगारी कब पूरे भारत में फैल गई पता ही नहीं चला। बिहार से उठी सम्पूर्ण क्रांति की चिंगारी देश के कोने-कोने में आग बनकर भड़क उठी। इसी वर्ष इंदिरा गांधी की सरकार ने देश में इमरजेंसी घोषित कर दी। जयप्रकाश जी को चंडीगढ़ के एक अस्पताल में कैद कर दिया। तब दिल्ली के रामलीला मैदान में एक लाख से अधिक लोगों ने जयप्रकाश जी की गिरफ्तारी के खिलाफ हुंकार भरी थी। उस समय आकाश में सिर्फ उनकी ही आवाज सुनाई देती थी। उसी वक्त राष्ट्रकवि रामधारी सिंह श्दिनकरश् ने कहा था श्सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।श्

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वर्ष 1977 को इमरजेंसी उठाई गई और जयप्रकाश जी के नेतृत्व में बहुत सी पार्टियों ने संगठित होकर एक जनता पार्टी बनाई और इस जनता पार्टी ने इन्दिरा गांधी की कांग्रेस पार्टी को हराकर बहुमत से सत्ता हासिल की। जनता पार्टी की इस विजय में उसके चुनाव घोषणा पत्र का बड़ा हाथ था। वर्ष 1977में हुआ चुनाव ऐसा था जिसमें नेता पीछे थे और जनता आगे थी। यह जेपी के ही करिश्माई नेतृत्व का असर था।

8 अक्टूबर 1979 को जयप्रकाश नारायण ने इस संसार से विदा ली। 1999 में उन्हें मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें समाजसेवा के लिए 1965 में मैगससे पुरस्कार प्रदान किया गया था। पटना के हवाई अड्डे का नाम उनके नाम पर रखा गया है। दिल्ली सरकार का सबसे बड़ा अस्पताल ‘लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल’ भी उनके नाम पर है। सच्चे अर्थों में जयप्रकाश जी त्याग एवं बलिदान की प्रतिमूर्ति थे।

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