कांशी राम /फाइल फोटो
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भारत रत्न डाॅ. भीमराव आंबेडकर ने देश में दलितों के लिए सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों की पैरवी की। लेकिन जिस एक दलित नेता ने उनकी विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए भारतीय राजनीति और समाज में एक बड़ा परिवर्तन लाने वाले की भूमिका निभाई वो हैं कांशीराम।

5 मार्च, 1934 को पंजाब के रोपड़ जिले के एक गांव खवासपुर में काशीराम का जन्म हुआ था। काशीराम जिस परिवार में पैदा हुए थे, वह रमदासिया चमार जाति का परिवार था। लेकिन बाद में इस परिवार ने सिख धर्म को अपना लिया। काशीराम के पिता हरि सिंह के सभी भाई सेना में थे।

कांशीराम के दिल व दिमाग दोनों पर बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर का पूरा प्रभाव पड़ा था। शिक्षा पूरी करने के बाद 22 साल की उम्र में यानी 1956 में काशीराम को सरकारी नौकरी मिल गई। 1958 में उन्होंने डिफेंस रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट आर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ) में काम करना शुरू कर दिया। वे पुणे के पास डीआरडीओ की एक प्रयोगशाला में सहायक के तौर पर काम करते थे। यहां आने के बाद उन्होंने देखा कि पिछड़ी जाति के लोगों के साथ किस तरह का भेदभाव या उनका किस तरह से शोषण हो रहा है।

कांशी राम / फाइल फोटो

कांशीराम के लिए यह स्तब्ध और दुखी कर देने वाला अनुभव था। यहीं से कांशीराम में एक ऐसी चेतना की शुरुआत हुई जिसने उन्हें सिर्फ अपने और अपने परिवार के हित के लिए काम करने वाले सरकारी कर्मचारी के बजाय एक बड़े मकसद के लिए काम करने वाला राजनेता बनने की दिशा में आगे बढ़ा दिया। काशीराम को अंबेडकर और उनके विचारों से परिचित कराने का काम डीके खपारडे ने किया। खपारडे भी डीआरडीओ में ही काम करते थे। वे जाति से महार थे लेकिन बाद में उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया था।

कांशी राम /फाइल फोटो

बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के बाद पहली बार किसी शख्स ने उत्तर भारत में दलित तबके में यह उम्मीद जगाई थी कि उनके जातिवादी बंधन टूट भी सकते हैं। उनकी सरकार बन भी सकती है और उच्च जातियां उनके वजूद को स्वीकार करने को मजबूर भी हो सकती हैं।

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इसी सोच के तहत कांशीराम ने दलित समाज के हक और हुकूक के लिए पहले डीएस-4, फिर बामसेफ और 1984 में दलित, ओबीसी और अल्पसंख्यक समाज के वैचारिक नेताओं को जोड़कर बहुजन समाज पार्टी का गठन किया। देश के कई राज्यों में बीएसपी का जनाधार बढ़ने लगा। इसी कड़ी में कांशीराम के संपर्क में मायावती आईं तो उत्तर प्रदेश में बीएसपी को एक नई ताकत मिली। 1993 में बीएसपी ने एसपी के साथ मिलकर यूपी में सरकार बनाई और फिर तो बीएसपी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। एक के बाद एक कामयाबी की सीढ़ी मायावती भी चढ़ती गईं। 2007 में तो बीएसपी ने सूबे में ऐतिहासिक जीत का परचम फहराया।

कांशीराम ने बहुजनवाद की संरचना की। उन्होंने अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग को मिलाकर जो गठबंधन बनाया वो भारतीय राजनीति के लिए एक नवीन प्रयोग था। कांशीराम कहा करते थे कि ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’।

कांशी राम /फाइल फोटो

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कांशीराम ने पार्टी के गठन के साथ ‘बहुजन समाज’ का एक पुख्ता आधार तैयार किया। वे देश के विभिन्न हिस्सों में घूम घूमकर 1984 से लगातार केवल पिछड़े, दलितों, आदिवासियों व अल्पसंख्यकों के बीच अभियान चलाते रहे। 1991 में इटावा से उपचुनाव जीतने के बाद उन्होंने स्पष्ट किया कि चुनावी राजनीति में नया समीकरण आरम्भ हो गया है। इसके बाद उन्होंने दिल्ली की गद्दी तक पहुंचने के इरादे से मुलायम सिंह यादव की पार्टी समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया।

कांशीराम ने पार्टी के गठन के साथ ‘बहुजन समाज’ का एक पुख्ता आधार तैयार किया। वे देश के विभिन्न हिस्सों में घूम घूमकर 1984 से लगातार केवल पिछड़े, दलितों, आदिवासियों व अल्पसंख्यकों के बीच अभियान चलाते रहे। 1991 में इटावा से उपचुनाव जीतने के बाद उन्होंने स्पष्ट किया कि चुनावी राजनीति में नया समीकरण आरम्भ हो गया है। इसके बाद उन्होंने दिल्ली की गद्दी तक पहुंचने के इरादे से मुलायम सिंह यादव की पार्टी समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया।

कांशी राम और मायावती /फाइल फोटो

भारत की आबादी के करीब 16.6 फीसदी दलित हैं और इनमें से करीब आधे, चार राज्यों उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार और तमिलनाडु में रहते हैं. पूरे देश के कुल दलितों का पांचवा हिस्सा यानी 20 फीसदी के करीब उत्तर प्रदेश में रहते हैं। लेकिन उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति में बहुत बदलाव नहीं आया है। हालांकि दलितों में सामाजिक, राजनीतिक चेतना के स्तर में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। इसी चेतना के दम पर मायावती चार बार देश के सबसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री बनीं।

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दलितों के उत्थान को लेकर कांशीराम की सोच थी कि उनमें आत्मविश्वास होना चाहिए। वो इन्हें ‘लेने वाले’ समाज से ‘देने वाले’ समाज में तब्दील करना चाहते थे और उन्होंने एक सोई हुई कौम को जगाने में बहुत हद तक कामयाबी हासिल भी की।

9 अक्टूबर, 2006 को लंबी बीमारी के बाद कांशीराम का नई दिल्ली में निधन हो गया। दलित चेतना जगाने वाले कांशीराम की आज 13वीं पुण्य तिथि है। आज ये सवाल मौजू है कि कांशीराम की विचारधारा को क्या आज का कोई दलित नेता आगे बढ़ाने का काम कर रहा है? दलित राजनीति के जानकार कुछ लोगों के मुताबिक, ‘मायावती के सिवा आज का कोई भी दलित नेता लेकर नहीं चल रहा है। यहां तक आज के दलित नेता उनका नाम लेने से भी परहेज करते हैं।’’

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