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आज विश्व पशु दिवस है। आज के दिन पशुओं के अधिकारों और उनके कल्याण आदि से संबंधित विभिन्न कारणों की समीक्षा की जाती है। यह दिन असीसी के सेंट फ्रांसिस के सम्मान में चुना गया है, जो जानवरों के लिए पशु प्रेमी और संरक्षक संत थे। यह दिन जानवरों के प्रति क्रूरता, पशु अधिकारों के उल्लंघन आदि जैसे विभिन्न मुद्दों पर जागरूकता पैदा करने का अवसर पैदा करता है।

दुनिया के तमाम देशों में मनुष्यों की भांति पशुओं को भी अधिकार प्राप्त है। लेकिन हमारे देश में पशु अधिकारों के लिये कानून तो हैं, लेकिन वो इतना पुराना, घिसा-पिटा है कि उसका होने या न होने से कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। देश में मौजूदा कानून पशु क्रूरता रोकथाम एक्ट 1960 की जगह नये कानून लाने की तैयारी सरकार कर रही है। देश में पशु क्रूरता के लचर कानूनों और मामूली जुर्माने के चलते जानवरों पर अत्याचार के मामले लगातार बढ़ रहे हैं।

हमारा संविधान हर जीवित प्राणी के प्रति सहानुभूति रखना हर नागरिक का मूल कर्तव्य माना गया है। संविधान के अनुच्छेद 51(।) में इसकी व्यवस्था है। ईशोपनिषद् समस्त मानव जाति को निर्देश देते हुए कहता है- ईशावास्यमिदं सर्वम् यत्किञ्च जगत्यां जगत। अर्थात जड़-चेतन प्राणियों वाली यह समस्त सृष्टि परमात्मा से व्याप्त है। अपने शास्त्र कहते हैं कि इस धरती पर सभी जीवों के अधिकार एक समान हैं, किसी को अधिकार नहीं है कि दूसरे का जीवन छीने या उसे कष्ट दे। अधिकार न तो इंसानी होते हैं ना पाश्विक वो सार्वभौमिक होते हैं।

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पिछले तीन साल में देशभर में पशु क्रूरता के 24000 से ज्यादा दर्ज किये गये। जिनमें से 19208 मामले अकेले मुंबई में दर्ज किये गये। और हैरानी की बात यह है कि पिछले पांच साल में पशु क्रूरता के मामलों में एक भी गिरफ्तारी नहीं हुई। वर्ष 2018 में सड़क व रेल हादसों में 161 वन्य जीव मारे गए। वहीं सौ से ज्यादा बाघ करंट, जहर खाने और अन्य वजहों से अपने प्राण गंवा बैठे। वहीं पिछले साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2330 हाथी मानव-पशु संधर्ष में मारे गए। इनमें से 67 हाथी ट्रेन से कट गए।

पशु क्रूरता निवारण अधिनियम और खाद्य सुरक्षा अधिनियम में इस बात का उल्लेख है कि कोई भी पशु (मुर्गी समेत) सिर्फ बूचड़खाने में ही काटा जाएगा। बीमार और गर्भधारण कर चुके पशु को मारा नहीं जाएगा। भारतीय दंड संहिता की धारा 428 और 429 के मुताबिक किसी पशु को मारना या अपंग करना, भले ही वह आवारा क्यों न हो, दंडनीय अपराध है। प्रिवेंशन ऑफ क्रूएलिटी ऑन एनिमल्स एक्ट (पीसीए) 1960 के मुताबिक किसी पशु को आवारा छोड़ने पर तीन महीने की सजा हो सकती है।

वन्यजीव अधिनियम के अंतर्गत बंदरों को कानूनी सुरक्षा दी गई है। कानून कहता है कि बंदरों से प्रदर्शन करवाना या उन्हें कैद में रखना गैरकानूनी है। इस नियम के तहत कुत्तों को दो श्रेणियों में बांटा गया है। पालतू और आवारा। कोई भी व्यक्ति या स्थानीय प्रशासन पशु कल्याण संस्था के सहयोग से आवारा कुत्तों का बर्थ कंट्रोल ऑपरेशन कर सकती है। उन्हें मारना गैरकानूनी है।

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जानवर को पर्याप्त भोजन, पानी, शरण देने से इनकार करना और लंबे समय तक बांधे रखना दंडनीय अपराध है। इसके लिए जुर्माना या तीन महीने की सजा या फिर दोनों हो सकते हैं। पशुओं को लड़ने के लिए भड़काना, ऐसी लड़ाई का आयोजन करना या उसमें हिस्सा लेना संज्ञेय अपराध है।

ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक रूल्स 1945 के मुताबिक जानवरों पर कॉस्मेटिक्स का परीक्षण करना और जानवरों पर टेस्ट किये जा चुके कॉस्मेटिक्स का आयात करना प्रतिबंधित है। स्लॉटर हाउस रूल्स 2001 के मुताबिक देश के किसी भी हिस्से में पशु बलि देना गैरकानूनी है।

चिड़ियाघर और उसके परिसर में जानवरों को चिढ़ाना, खाना देना या तंग करना दंडनीय अपराध है। पीसीए के तहत ऐसा करने वाले को तीन साल की सजा, 25 हजार रुपये का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। पशुओं को असुविधा में रखकर, दर्द पहुंचाकर या परेशान करते हुए किसी भी गाड़ी में एक जगह से दूसरी जगह ले जाना मोटर व्हीकल एक्ट और पीसीए एक्ट के तहत दंडनीय अपराध है।

कानून के अनुसार 750 किलोग्राम से ज्यादा का सामान घोड़ा और भैंस गाड़ी पर नहीं लादा जा सकता है। वहीं दिन में 12 से तीन बजे के बीच तेज धूप में जानवरों से काम नहीं लिया जा सकता है। पीसीए एक्ट के सेक्शन 22 (2) के मुताबिक भालू, बंदर, बाघ, तेंदुए, शेर और बैल को मनोरंजन के लिए ट्रेन करना और इस्तेमाल करना गैरकानूनी है। पंछी या सरीसृप के अंडों को नष्ट करना या उनसे छेड़छाड़ करना या फिर उनके घोंसले वाले पेड़ को काटना या काटने की कोशिश करना शिकार कहलाएगा। इसके दोषी को सात साल की सजा या 25 हजार रुपये का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। किसी भी जंगली जानवर को पकड़ना, फंसाना, जहर देना या लालच देना दंडनीय अपराध है। इसके दोषी को सात साल की सजा या 25 हजार रुपये का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।

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जुलाई वर्ष 2018 में उत्तराखंड हाईकोर्ट के न्यायाधीश राजीव शर्मा और लोकपाल सिंह की पीठ ने एक अनोखा फैसला सुनाते हुए कहाकि, जानवरों का भी एक अलग व्यक्तित्व होता है। जीवित मनुष्य की तर्ज पर उनके पास भी अधिकार, कर्तव्य और उत्तरदायित्व होते हैं। अदालत ने जानवरों को विशेष दर्जा प्रदान करते हुए उनके खिलाफ क्रूरता रोकने के लिए भी कई निर्देश जारी किए। जानवरों की सुरक्षा और कल्याण के लिए कोर्ट ने उत्तराखंड के सभी निवासियों को सभी जानवरों का अभिभावक घोषित किया है और इनकी सुरक्षा-स्वास्थ्य, संरक्षण, सम्मान को लेकर कई तरह के निर्देश जारी किए।

हमें पता है कि जानवर भी अपने बच्चों की परवरिश करते, उन्हें सिखाते हैं। उन्हें भी खान-पान और भविष्य की चिंता होती है। उन्हें भी घर की याद सताती है, जानवरों को भी मौत से डर लगता है। जानवरों का सम्मान करना, उनके अधिकारों को मानना हमारी जिम्मेदारी है। जानवर न तो संपत्ति हैं और न ही संसाधन। वो हमारी सेवा के लिए नहीं हैं, उनके अधिकार देने के लिए हमें ये समझना होगा कि हम उनके साथ बर्ताव कैसा करते हैं। लड़ाई मानवाधिकार और जानवरों के हक की नहीं है। ये हमारी जिम्मेदारी है कि हम जानवरों का शोषण न करें।

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