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आज जो पीढ़ी सोशल मीडिया पर है, उससे एक पायदान पहले और उसके ऊपर की पीढ़ियों के बहुत से लोगों का यह किस्सा हो सकता है। यह दास्तां उनकी हो सकती है जो चालीस पार कर गए हैं। वे अब कभी जब अपने मुहब्बत के दिनों की जुगाली करते होंगे तो उनके जहन में कुछ हिंदी गाने जरूर गूंजते होंगे। उन्हें याद आता होगा महफिलों में जब गाने को कह दिया जाता था, वे अक्सर कई गाने बार-बार गुनगुनाते थे, यह सोचे बिना कि सुर में हैं या नहीं। कॉलेज की कैंटीन में बैठकर, या रात भर किसी की याद में करवटें बदलते हुए उन्होंने कहा होगा, ‘होंठ पे लिए हुए दिल की बात हम, जागते रहेंगे और कितनी रात हम, मुख्तसर सी बात है तुमसे प्यार है, तुम्हारा इंतजार है…तुम पुकार लो।’

इस गाने की शुरुआत में हुई ‘हमिंग’ और ‘पुकार लो’ को ध्यान से सुनिएगा। वह मोहब्बत की बैचनी को जाहिर करता हुआ एक अंतर्नाद है। और आखिर में जो सीटी बजती है न, वह दिल की कितनी गहराइयों में उतर जाती है, यह उनसे पूछिए जो चालीस पार कर गए है।

इस गाने को हेमंत कुमार ने कंपोज किया और गाया था। जन्मजात प्रतिभा बनाम मेहनत की बहस जाने कब से है। आपको जानकार हैरत होगी कि हेमंत दा क्लासिकल संगीत नहीं सीख पाए थे। कोशिश की थी उन्होंने इसकी। चूंकि संगीत की समझ लेकर पैदा हुए थे तो इससे बेहतर क्या काम सकते थे? और नियति भी उन पर मेहरबान रही वरना उनके पिता ने उनके लिए कुछ और ही सपने देखे थे। यह प्रतिभा की ही जीत हो सकती है कि कुछ लोग मानते हैं कि बांग्ला फिल्म इंडस्ट्री में हेमंत दा से बड़ा कोई गायक नहीं हुआ जबकि वहां किशोर कुमार भी अपना स्थान रखते हैं।

हेमंत दा ने शानदार संगीत दिया और कमाल के गाने गाये। उनकी आवाज इतनी जबरदस्त थी कि सीधे सुनने वाले सीधे से गीत के भाव से कनेक्ट हो जाया करते। संगीतकार सलिल चैधरी ने तो इतना तक कह दिया था कि भगवान भी अगर गाता तो हेमंत दा की आवाज में गाता। लता मंगेशकर ने एक दफा कहा था कि हेमंत दा जब गाते थे तो ऐसा लगता था कोई पुजारी मंदिर में बैठकर गा रहा है।

ऊपर ‘हमिंग’ की बात की गयी थी। यह हेमंत दा का सिंगनेचर स्टाइल था। इसी स्टाइल को उन्होंने ‘आनंदमठ’, ‘जाल’ (दोनों 1952) में इस्तेमाल किया था। पंकज राग अपनी किताब ‘धुनों की यात्रा’ में जिक्र करते हैं कि ‘आनंदमठ’ के एक गीत, ‘कैसे रोकोगे इस तूफान को’ में प्रेम के शारीरिक तत्व को उभारने के लिए हेमंत ने तलत (महमूद) से भी हमिंग कराने में सफलता पायी।’

बतौर संगीतकार हेमंत की सफलता शुरू होती है फिल्मिस्तान स्टूडियो की ‘नागिन’ (1954) से। लता मंगेशकर का गाया हुआ, ‘मन डोले मेरा तन डोले’ ने गली-गली में धूम मचा दी थी। इस फिल्म की सफलता के पीछे इसका संगीत ही था। फिल्म के प्रोडूसर शशिधर मुखर्जी ने जब देखा कि फिल्म को ठंडा रेस्पॉन्स मिल रहा है तो उन्होंने इसके संगीत के एक हजार रिकाडर्स होटलों और रेस्तरां में मुफ्त में बंटवा दिए। जब फिल्म के गाने लोगों के जहन में उतरे तो सिनेमा हॉलों में दर्शक टूट पड़े।

इसके बाद हेमंत दा को पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं पड़ी। बांग्ला सिनेमा में तो वे हिट हो ही चुके थे, ‘नागिन’ के बाद वे उस दौर के हिंदी सिनेमा के व्यस्ततम संगीतकारों में एक हो गए। इस कदर व्यस्त हो गए कि कई बार उन्हें रोजाना हवाई जहाज पकड़कर मुम्बई और कोलकाता के बीच सफर करना पड़ता। पंकज राग बताते हैं, ‘एयर इंडिया ने उन्हें डेली पैसेंजर का खिताब दे दिया था।’

छठे दशक में जब फिल्मिस्तान स्टूडियो बंद होने की कगार पर आ गया तो हेमंत कुमार ने गीतांजलि स्टूडियो खोलकर कुछ यादगार फिल्में बनाई। उन्हें रहस्मयी और रोमांचक फिल्में बनाने का शौक था और कमाल की बात यह है कि उनका संगीत फिल्म की पटकथा पर भारी पड़ता था। मिसाल के तौर पर ‘बीस साल बाद’ (1961) का गाना ‘कहीं दीप जले कहीं दिल’ या ‘कोहरा’ (1964) का ‘झूम झूम ढ़लती रात’ जैसे गानों में ‘हॉन्टिंग इफेक्ट’ मदन मोहन के ‘नैना बरसे रिमझिम रिमझिम’ या ‘नैनों में बदरा छाये’ गानों की बराबरी करता है।

‘खामोशी’ (1969) हेमंत कुमार के लिए एक बड़ी सफलता लेकर आई। हेमंत दा के शानदार संगीत और गुलजार के फलसफाई गीतों ने तहलका मचा दिया। हेमंत कुमार का ‘तुम पुकार लो’, लता मंगेशकर का ‘हमने देखी है उन आंखों की महकती खूशबू’ और किशोर कुमार का ‘वो शाम कुछ अजीब थी’ खूब मशहूर हुए।

हेमंत दा और मदन मोहन के संगीत में दो बातें खास थीं। पहली यह कि इनमें आंचलिकता के बजाए शहरीपन या आधुनिकता झलकती थी और दूसरा दोनों के गानों में ‘हॉन्टिंग इफेक्ट’ कमाल का होता था. पंकज राग लिखते हैं, ‘छठे दशक के अंतिम वर्षों में हेमंत का झुकाव भारतीय मेलोडी और ऑर्केस्ट्रेशन की अपेक्षा आधुनिक ऑर्केस्ट्रेशन के साथ अपने खास गूंजते, प्रतिध्वनित असर वाले संगीत की तरफ बढ़ने लगा था।’

छठे दशक की फिल्में समाज की पुरानी सीमाओं को तोड़कर आगे निकलने की कोशिश बयान करती हैं। ऐसे में हेमंत दा का संगीत जिसमें आधुनिकता थी, बिल्कुल फिट बैठ जाता है और यही बात उन्हें सिनेमा के इतिहास में अलग स्थान पर ले जाकर खड़ा कर देती है। मिसाल के तौर पर ‘साहिब बीवी और गुलाम’(1962), ‘सन्नाटा’ (1966) और बांग्ला फिल्म ‘नील आकाशेर’ इसकी बानगी हो सकते हैं। ‘नील आकाशेर’ का गीत में नायक मोटरसाइकिल को तेजी से सड़क पर लहरा रहा है, तो जाहिर है गीत भी ऐसा ही होना चाहिए और हेमंत दा जादू कर जाते हैं। इसी तर्ज पर उन्होंने हिंदी में ‘एक बार जरा फिर कह दो, मुझे शरमा के तुम दीवाना’ रचा था।

इसी दौर के कई सितारों के सहारे आप इस बात को समझ सकते हैं। समाजवाद दिखाने का जिम्मा राज कपूर के सिर था. उसी प्रकार देवानंद, गुरुदत्त या बिश्वजीत के अंदाज में आधुनिकता दिखती थी। उधर, दिलीप कुमार हर खांचे में फिट हो जाते थे। हेमंत दा बीच की श्रेणी वालों के संगीतकार थे।

देवानंद की ‘सोलहवां साल’ का ‘है अपना दिल तो आवारा न जाने किस पे आएगा’ या बिश्वजीत पर फिल्माया ‘बेकरार करके हमें यूं न जाइए’ जैसे गाने, उनकी आवाज और उनका संगीत उस दौर के साथ न्याय करते नजर आते हैं। बतौर संगीतकार लता मंगेशकर ‘नागिन’ के बाद, उनकी सबसे पसंदीदा गायिका रहीं। आशा भोंसले के साथ भी हेमंत दा ने कई अच्छे गाने दिए। उनकी आवाज के साथ उनकी जादूगरी ‘भंवरा बड़ा नादान है’ में दिखती है। गीता दत्त के साथ उन्होंने कुछ कम काम किया, लेकिन वे भी हेमंत कुमार की कम पसंदीदा गायिका नहीं थीं। कम ही लोगों को मालूम है कि ‘कहीं दीप जले दिल’ पहले गीता ही गाने वाली थीं। और यह बात हेमंत दा भी जानते होंगे कि ‘पिया ऐसो जिया में समाय गयो रे’ तो शायद लता भी ऐसा नहीं गा पातीं।

जहां तक बांग्ला संगीत की बात है तो हेमंत कुमार के आसपास भी कोई नहीं है। वहां वे रविंद्र संगीत और आधुनिक संगीत के अलावा गायक के तौर पर सबसे बड़ा नाम हैं। जो ‘आनंदमठ’ हिंदी सिनेमा में उनकी शुरुआत करती है, वह पहले बांग्ला में बनी थी।

फिल्म संगीत में आधुनिकता के परिचायक हेमंत दा, सत्तर और अस्सी के दशकों की आधुनिकता की लिजलिजी चाशनी में कहीं फंसकर रहे गए और इस माहौल से निराश होकर उन्होंने काम करना बंद कर दिया। पर जो भी है, अगर हेमंत दा अपने पिता की बात मानकर इंजीनियर बन जाते तो ‘है अपना है दिल तो आवारा जा जाने किस पे आएगा’ कौन बनाता? इसलिए कहते हैं। सुनिए सबकी, करिए दिल की। (साभार: सत्याग्रह)

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