सरकार की गलत नीतियों के चलते अतिथि शिक्षकों का भविष्य गर्त में

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सरकार की गलत नीतियों के चलते अतिथि शिक्षकों के भविष्य पर संकट।
नागेन्द्रप्रसाद रतूड़ी / हरीश तिवारी सल्ट
उत्तराखंड राज्य बनने के बाद से राज्य में पलायन, स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था में सुधार करना अभी तक हर सरकार के लिए आज तक चुनौतीपूर्ण बना हुवा है। उल्लेखनीय है कि पहाड़ के दुर्गम विद्यालयों की स्थिति शिक्षकों की भारी कमी होने के कारण अत्यंत दयनीय बनी है । इसी के चलते पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के मुख्यमन्त्री हरीश रावत ने माध्यमिक विद्यालयो की शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए राज्य में अतिथि शिक्षको की भर्ती करने का निर्णय लिया। सितम्बर 2015 में सरकारी माध्यमिक विद्यालयों में अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति कर दी गयी।
अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति से राज्य में वर्षो से चल रही शिक्षको की कमी को पूर्ण कर लिया गया और सरकारी स्कूल में शिक्षा व्यवस्था की जर्जर स्थिति से उबरने के कयास लगाये जाने लगे। चूँकि अतिथि शिक्षकों को अनुबन्ध पर रखा गया जिस कारण बार बार ये कार्यमुक्त होते रहते है और समय रहते सरकार द्वारा इन्हें पुनर्नियुक्ति उचित समय पर नही दिए जाने के कारन विद्यालयो का शिक्षण कार्य पिछले 2 वर्षो से अव्यवस्थित है जबकि शिक्षकों द्वारा शिक्षण कार्य मनोयोग से किया गया इसके उपरांत भी अभी तक इन्हें नियमित रूप से कार्य पर रखे जाने की कोई नीति नही बन पायी है। पुनर्नियुक्ति और भविष्य सुरक्षित की मांग के लिये अतिथि शिक्षक संगठन द्वारा देहरादून में 4 बड़े प्रदेशव्यापी आंदोलन तक किये गए लेकिन सरकार के गम्भीर न होने के कारन इनका परिणाम अब तक शून्य ही रहा।
अच्छा होता यदि सरकार अतिथि शिक्षकों को नियमित रूप से विद्यालयों में नियुक्ति देती इससे राज्य के सरकारी विद्यालयों में पठन पाठन सुचारू रूप से चल पाता और अतिथि शिक्षक भी भविष्य सुरक्षित होने पर मानसिक तनाव से मुक्त हो पाते। किन्तु ये कार्य करने में राज्य में पूर्ववर्ती सरकार और वर्तमान सरकार दोनों ही विफल रही है। दुखद विषय है की माननीय राज्यपाल महोदय के अभिभाषण में अतिथि शिक्षको के समायोजन का जिक्र था लेकिन आज तक सरकार कोई ठोस कार्य नही कर पायी। असमन्जस की स्थिति होने से पिछले 2 साल से अतिथि शिक्षक और उनके परिवार जन मानसिक तनाव के शिकार हो गए है । सरकार को चाहिए की जल्द ही इस गम्भीर मुद्दे का संज्ञान ले और माननीय न्यायालय में ठोस पैरवी कर स्थायी समाधान निकाल कर अतिथि शिक्षको का भविष्य सुरक्षित करे।
राज्य की पूर्व सरकार द्वारा 13 अप्रैल 2015 को अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया से सम्बंधित शासनादेश जारी किया गया जिसके तहत सभी जनपदों और ब्लॉक द्वारा विज्ञापन जारी किये गए। और पुरे प्रदेश से योग्य अभ्यर्थियों द्वारा आवेदन किये गये.जिसमें लगभग 86000 हजार आवेदन आये और उनमे से 6214 अभ्यर्थियों का चयन हुवा। चयन प्रक्रिया ब्लॉक स्तर पर मेरिट के आधार हुयी।चयन हेतु जिले और ब्लॉक स्तर पर कमेटी बनाई गयी। *प्रत्येक जिले में जिलाधिकारी की अध्यक्षता मे मुख्य शिक्षा अधिकारी,जिला शिक्षा अधिकारी और डायट के प्राचार्य को कमेटी में सम्मिलित किया गया। ब्लॉक स्तर पर खंड शिक्षा अधिकारी की अध्यक्षता में उपखंड शिक्षा अधिकारी तहसीलदार को कमेटी में सम्मिलित किया गया
अतिथि शिक्षक की नौकरी करने कई लोग इस अस्थायी नौकरी के लिए अपनी अछि खासी नौकरी छोड़ कर इसलिए आ गए की भविष्य में हम शिक्षा मित्र और शिक्षा बन्धु की भांति अतिथि शिक्षक के रूप में ही नियमित हो सकेंगे।
अतिथि शिक्षकों के शासनादेश के अनुसार प्रवक्ता को 150₹ प्रति वादन और सहायक अध्यापक को 125₹प्रति वादन के हिसाब से मानदेय दिया गया इस प्रकार कई अतिथि शिक्षको का मानदेय 2000 से 3000₹ तक ही बन पाता था जिस कारन अल्प मानदेय में अपने परिवार का भरण-पोषण करना मुश्किल हो रहा था। इन तमाम कठिनाईयों के चलते शिक्षकोंो ने अपना पूर्ण योगदान विद्यालयो में दिया और छात्रो के चहुमुखी विकास करने का प्रयास किया।

*अतिथि शिक्षको से दुर्गम विद्यालयो को खासा लाभ*:—

राज्य में अतिथि शिक्षको की नियुक्ति होने से खासकर पहाड़ के दुर्गम विद्यालयो में शिक्षा की एक नई क्रांति सी आ गयी क्योंकि कई दुर्गम विद्यालय ऐसे थे जहा विद्यालय की स्थापना से लेकर अभी तक उस विद्यालय के छात्रो ने महत्वपूर्ण विषयो के शिक्षक नही देखे थे।
अतिथि शिक्षको द्वारा दुर्गम और अति दुर्गम विद्यालयो में सेवा देने से वहा के क्षेत्र के बच्चो और अभिभावको में एक ख़ुशी की लहर थी कि अब उनके बच्चे भी सुचारू रूप से पढ़ाई करके अपने सपने पुरे कर सकेंगे।अतिथि शिक्षको की नियुक्ति के बाद राज्य की शिक्षा व्यवस्था धीरे धीरे पटरी पर आने लगी । क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियो और अभिभावको ने अतिथि शिक्षको के कार्य की खूब सराहना की । सभी अतिथि शिक्षको ने पूर्ण मनोयोग से शिक्षण कार्य किया यहा तक की कई विद्यालयो में अतिथि शिक्षको ने शीतकालीन अवकाश में भी विद्यालय में पठन पठान कराया । जिसके परिणामस्वरूप बोर्ड के रिजल्ट प्रतिशत में भी गत वर्षो की तुलना में वृद्धि हुयी।चूँकि अतिथि शिक्षको का अनुबंध 31 मार्च 2016 को समाप्त हो गया था । इस दौरान राज्य में राष्ट्रपति शासन लगने के कारन अतिथि शिक्षको को नियुक्ति में विलम्ब हुवा । नियुक्ति की मांग को लेकर देहरादून में प्रदेशव्यापी आंदोलन करना पड़ा इस आंदोलन में पूर्व मुख्यमन्त्री हरीश रावत ने भी अतिथि शिक्षको को पूर्ण समर्थन दिया। 11 मई 2016 को राष्ट्रपति शासन समाप्त होने के बाद हरीश रावत फिर से प्रदेश के मुखिया बन गए। इधर माध्यमिक विद्यालयो में शिक्षको की कमी होने से पठन पाठन पर खासा असर पड़ रहा था ।
सरकार से लगातार नियुक्ति की मांग को लेकर प्रयास किया गया और सितम्बर 2016 में पुनः अतिथि शिक्षको को नियुक्ति मिली और मानदेय 15000₹ फिक्स कर दिया गया। छात्र-छात्राओ के भविष्य को देखते हुए अतिथि शिक्षको की पुनर्नियुक्ति सरकार द्वारा जरूर कर दी गयी लेकिन जिन बच्चो के भविष्य को संवारन के लिए अतिथि शिक्षको की नियुक्ति की गयी उन शिक्षको के खुद का भविष्य अभी तक सरकार द्वारा सुरक्षित नही किया गया है ।

*विद्यालयो में शिक्षक भेजने व अतिथि शिक्षको के भविष्य सुरक्षित करने में नाकाम रही सरकार*:–

प्रत्येक वर्ष शिक्षा सत्र समाप्त होने के साथ ही विद्यालयो से अतिथि शिक्षक भी कार्यमुक्त हो जाते है और फिर से विद्यालयो में शिक्षको की कमी हो जाती है। शासनादेश के अनुसार अतिथि शिक्षको की नियुक्ति अनुबन्ध समाप्त होने या उनके स्थान पर नियमित शिक्षक आने तक के लिए होने का प्रावधान है जिसके कारण कई अतिथि शिक्षक ऐसे भी थे की दुर्भाग्यवश नियुक्ति के 7-8 दिन बाद ही उनके स्थान पर नियमित शिक्षक आने से उन्हें कार्यमुक्त कर दिया गया।
इस प्रकार अधिकांश शिक्षक 2016 से कार्यमुक्त (प्रभावित)है लेकिन अभी तक उनके समायोजन हेतु सरकार द्वारा कोई ठोस कार्य नही किया गया जिससे वो बहुत अधिक तनाव में है। सुरक्षित भविष्य को लेकर अतिथि शिक्षको की लड़ाई प्रथम नियुक्ति से लेकर आज तक जारी है किन्तु अभी तक सरकार द्वारा सुरक्षित भविष्य हेतु कोई ठोस नीति नही बनाई गयी। 31 मार्च 2017 को भी अनुबन्ध समाप्ति पर फिर से सभी अतिथि शिक्षक कार्यमुक्त हो गए और उधर विद्यालयो में शिक्षको की भारी कमी होने से पठन पाठन बुरी तरह प्रभावित होने लगा कई स्कूलो में मई 2017 में विद्यालयो में क्षेत्रीय जनता और अभिभावको द्वारा विद्यालयो में शिक्षको की कमी को दूर करने के लिये बड़े आंदोलन किये गए उस समय प्रदेश के शिक्षा मंत्री ने वादा किया की जुलाइ 2017 तक मैं हर हाल में विद्यालयो में शिक्षक भेज दूंगा परन्तु उनका यह वादा भी विफल ही रहा । आज भी कई विद्यालयो में शिक्षको की कमी को जल्द पूरा करने हेतु आंदोलन किये जा रहे है परन्तु सरकार अभी भी इस मामले में चुप्पी साधे हुए है । इसे उत्तराखंड का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि डबल इंजन की भाजपा सरकार में , सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को आधा शिक्षा सत्र बीत जाने के बाद भी शिक्षक उपलब्ध कराने में सरकार विफल रही और दूसरी ओर सरकार द्वारा अतिथि शिक्षकों के सुरक्षित भविष्य को लेकर भी कोई स्पष्ट नीति अब तक नही बन पायी। इसी के चलते विगत दो वर्ष से अतिथि शिक्षक तनावग्रस्त है इन 2 वर्षो में 3-4 अतिथि शिक्षको द्वारा आत्महत्या तक कर ली गयी ।
कुछ समय पूर्व ही कोटद्वार निवासी अतिथि शिक्षिका सपना रावत ने नियुक्ति न होंने से मानसिक तनाव के चलते जहरीला पदार्थ खाकर आत्महत्या कर ली । किन्तु सरकार अभी तक इस मामले के प्रति गम्भीर नही है। भविष्य में और भी साथी तनावग्रस्त रहने के। कारन कोई गलत कदम उठा सकते हैंतो इसकी जिम्मेदारी सरकार की नीतियों को माना जाएगा.
राज्य के माध्यमिक विद्यालयो से मार्च 2017 में कार्यमुक्त हुए प्रवक्ता अतिथि शिक्षक अभी तक अपनी पुनर्नियुक्ति की राह देख रहे है अतिथि सन्गठन द्वारा सरकार से कई बार कोर्ट में विचाराधीन मामले का  शीघ्र समाधान करने की गुजारिश की गयी परन्तु सरकार ने इस ओर बिलकुल भी ध्यान नही दिया है ।
उल्लेखनीय है की सरकार द्वारा कोर्ट में  सहायक अध्यापक अतिथि शिक्षको की पैरवी मजबूती से की गयी जिसके परिणामस्वरूप सहायक अध्यापक अतिथि शिक्षको को 1 माह पूर्व विद्यालयो में नियुक्ति मिल गयी है परन्तु प्रवक्ता अतिथि शिक्षक अभी तक नियुक्ति का इंतजार कर रहे है।
सरकार द्वारा कोर्ट में मजबूत पैरवी न करने के कारन प्रवक्ता का मामला कई महीनो से कोर्ट में ही लम्बित है जिस कारन कई प्रवक्ता अतिथि शिक्षक विगत 6 माह से मानसिक तनाव से ग्रसित हैं।
ज्ञातव्य है की नियुक्ति न होने पर अतिथि शिक्षकों का मानसिक तनाव बढ़ता ही जा रहस है। यदि सरकार जल्द समाधान नही करती तो अतिथि शिक्षकों के पास आंदोलन करने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं बचता है.

             

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