पुलिस का काम है गौरी लंकेश के हत्यारों को पकड़ना, पत्रकारों का नहीं

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पुलिस का काम है गौरी लंकेश की हत्या के अपराधियों को पकड़ना. पत्रकारों का नहीं.
लेख-नागेन्द्र प्रसाद रतूड़ी
किसी भी नागरिक की जान माल की सुरक्षा की जिम्मेदारी वहां के सरकार की होती है और सरकार की ओर से इस जिम्मेदारी को पुलिस निभाती है इसके लिए पुलिस को जनबल,धनबल,शस्त्रबल,शक्तिबल आदि से मंडित किया जाता हैं. ऐसे में अगर किसी नागरिक की हत्या होती है तो वह वहां की सरकार और पुलिस विभाग की अक्षमता को उजागर करता है. सरकार की इसलिए कि उसका प्रभाव ऐसा नहीं है कि पुलिस मुस्तैद नहीं रहती. और जब पुलिस मुस्तैद नहीं होती तब गुंडे, बदमाश एवं हत्यारे सक्रिय हो जाते हैं. जिसका उदाहरण गौरी लंकेश की हत्या होना है.
हत्या किसी ने भी की हो निंदनीय होती है.और हत्यारों को सजा मिलनी ही चाहिए गौरी लंकेश पर हत्यारों द्वारा सात गोली मारे जाने की घटना से यह साबित होता है कि हत्यारों को न सरकार की परवाह थी न पुलिस का खौफ था.
कर्नाटक निवासी पी. लंकेश की पुत्री गौरी लंकेश को 05 सितंबर2017 को बंगलौर के राजराजेश्वरी नगर में उनके घर के दरवाजे पर अज्ञात बंदूकधारियों ने गोलीमार कर हत्या कर दी.
स्व. पी लंकेश की तीन संतानें गौरी, कविता और इंद्रजीत तीन संतानें थीं.गौरी ने बबेंगलूरू के नवभारत टाईम्स से अपना पत्रकारिता कैरियर अपनाया. उनका विवाह चिदानंद राजघट्ट से हुअा. जिनके साथ वह कुछ समय तक दिल्लगौरी अपने पिता द्वारा स्थापित कन्नड़ साप्ताहिक पत्रिका की संपादक थी. बेंगलूरू के संडे मैगजीन में रिपोर्टर के रूप में नियुक्त होने पर वह बेंगलूरू लौट आयी. जहां वह नौ वर्ष तक कार्यरत् रही. सन् 2000ई़ मे पिता पी लंकेश की हृदयाघात से मृत्यु होने पर गौरी लंकेश ने पिता की पत्रिका का संपादकीय संभाला तथा भाई इंद्रजीत ने व्यवसायिक पक्ष संभाला. सन् 2001में दोनों में मतभेद प्रारंभ हो गये और 2005 में दोनों के मतभेद उस समय सार्वजनिक हो गये जब गौरी ने नक्सलियों के पक्ष में रिपोर्ट लगाई और इन्द्रजीत ने वह रिपोर्ट वापस ले ली.इन्द्रजीत ने गौरी पर पुलिस में पत्रिका के प्रकाशन कार्यालय से कंप्यूटर, स्केनरऔर प्रिंटर चुराने का आरोप लगाया तो गौरी नेअपने भाई पर बंदूक दिखा कर धमकाने का आरोप लगाया. गौरी के भाई ने पत्रकार वार्ता में उसपर नक्सलियों को बढावा देने का आरोप लगाया.इसी मतभेद के कारणबाद गौरी ने 2005 में “गौरी लंकेश पत्रिके” का प्रकाशन प्रारंभ कर दिया.
गौरी की मौत पर बेंगलूरू के पुलिस कमिश्नर ने पत्रकारों को बताया कि गौरी की हत्या की वजह क्या थी पर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता है.
वामपंथ के निकट होने के कारण गौरी बीजेपी और आरएसएस की कट्टर आलोचक थी. उसकी हत्या का कारण भी उसके समर्थक उसके लेखों को मान रहे हैं.
हो सकता है कि गौरी लंकेश की हत्या उसके लेखों के कारण हुई हो. पर यह भी तो संभव है कि उसकी हत्या के पीछे लेन देन या संपत्ति विवाद भी हो सकता है.
बेंगलूरू पुलिस को भी अभी तक इस हत्या का कारण पता नहीं लगा पर हमारे वामपंथी मित्रों व पत्रकारों का अनुसंधान इतना विकसित हो गया है कि उन्होंने इस हत्या के लिए आर. एस. एस. और बीजेपी व हिन्दुत्व की ओर संकेत कर दिया है. लगता है उन्हें पुलिस पर भरोसा नहीं है.मैंने ऐसे मित्रों को धैर्य रखने को और पुलिस की जांच आने देने को लिखा तो सभी भड़क उठे. क्या यह नहीं हो सकता कि उनका किसी और से विवाद रहा हो और उसने उनके तथाकथित सांप्रदायिकता विरोधी लेख के छपते ही अपनी खुन्नस निकाल ली हो.ऐसी स्थिति में जैसा हो रह है वैसे ही होना था. याने शक की सुई सीधे उन संस्थाओं पर जाती जिनके विरुद्ध लेख लिखा गया है.यह भी हो सकता है कि जिन संस्थाओं पर उंगलियां उठ रही हैं वही दोषी हों. पर यह सब तो तभी साफ हो सकेगा जब पुलिस जांच पूरी हो.
मुझे पत्रकारों के दोगले व्यवहार पर भी बड़ा आश्चर्य होता है जब भी वामपंथ से जुड़ा कोई पत्रकार मारा जाता है तो सब चिल्लाने लग जाते हैं पर वामपंथ से हटकर मारे गये पत्रकार पर चुप्पी क्यों उदाहरण है उत्तरप्रदेश का पत्रकार जोगेन्द्र हत्याकांड, जिसकी हत्या पर दो चार पत्रकारों के अलावा कोई बड़ा संगठन सामने नहीं आया यहां तक कि तथाकतथित बड़े पत्रकारों के संगठनों ने तो उसे पत्रकार मानने से ही इंकार कर दिया था. अगर बड़े पत्रकारों के पास स्टिंगरों व अब एक नयी श्रेणी संवादसूत्र के दुख सुख के लिए समय नहीं है तो ये लोग भी उनका साथ कैसे देंगे.
पत्रकारों, चाहे वह किसी भी श्रेणी का हो,की हत्या की निंदा होनी ही चाहिए,उसके हत्यारों को कड़ी से कड़ी सजा होनी चाहिए. पर इसका मतलब यह नहीं कि हत्या का आरोप किसी पर भी लगा दिया जाय और उस पर राजनीति की जाय.
यदि कर्नाटक में शासन व्यवस्था ठीक होती,पुलिस का प्रभाव होता तो हत्यारे सात गोली दागने का साहस न करते. इसके लगता है कि वहां शासन व्यवस्था व पुलिस व्यवस्था बहुत सही नहीं है. और वहां हत्यारे इतने निर्भय हैं कि किसी की भी हत्या कर सुरक्षित निकल जाते है. यह वहां की सरकारी व पुलिस व्यवस्था पर बहुतबड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है.

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