पितरों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन है श्राद्ध

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पितरों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन है श्राद्ध,

लेख-ज्योतिषाचार्य पंडित जयकृष्ण सेमवालश्राद्ध में श्रृद्धापूर्वक पितरों को जो भी वस्तु उचित काल या स्थान पर विधि द्वारा ब्राह्मणों को दी जाती है। इस सबका उल्लेख ब्रह्म पुराण में मिलता है। यह एक ऐसा माध्यम जिससे पितरों को तृप्ति के लिए भोजन दिया जाता है। पिण्ड रूप में पितरों को दिया गया भोजन श्राद्ध का अहम हिस्सा माना जाता है।
कब करना चाहिए श्राद्ध
श्राद्ध करने का सभी का अपना एक समय होता है। श्राद्ध मृत परिजनों को उनकी मृत्यु की तिथि पर श्रद्धापूर्वक श्राद्ध देने की विधि है। उदाहरण के तौर पर अगर किसी परिजन की मृत्यु एकादशी को हुई है तो उनका श्राद्ध एकादशी के दिन ही किया जाएगा। इसी प्रकार अन्य तिथियों के हिसाब से किया जाता है।
– यदि पिता और माता दोनों ही नहीं हैं तो पिता का श्राद्ध अष्टमी के दिन और माता का नवमी के दिन किया जाएगा।
* जिन लोगों की अकाल मृत्यु हुई यानि कि किसी दुर्घटना या आत्महत्या के कारण हुई हो तो उनका श्राद्ध चतुर्दशी के दिन होता है।
* जो व्यक्ति अपने जीवन काल में साधु और संन्यासी रहा हो तो उनका श्राद्ध द्वाद्वशी के दिन किया जाता है।
* जिन लोगों को अपने पितरों के मरने की तिथि याद नहीं रहती, उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन किया जाता है। इसे सर्व पितृ श्राद्ध कहा जाता है।
श्राद्ध या पिन्डदान कितने प्रकार के है श्राद्ध या पिन्डदान क्यो करना चाहिए श्राद्ध या पिन्डदान के महत्व विषय के लिए अवश्य पढ़े
पितरों की संतुष्टि के उद्देश्य से श्रद्धापूर्वक किये जाने वाले तर्पर्ण, ब्राह्मण भोजन, दान आदि कर्मों को श्राद्ध कहा जाता है. इसे पितृयज्ञ भी कहते हैं. श्राद्ध के द्वारा व्यक्ति पितृऋण से मुक्त होता है और पितरों को संतुष्ट करके स्वयं की मुक्ति के मार्ग पर बढ़ता है.
श्राद्ध या पिन्डदान दोनो एक ही शब्द के दो पहलू है पिन्डदान शब्द का अर्थ है अन्न को पिन्डाकार मे बनाकार पितर को श्रद्धा पूर्वक अर्पण करना इसी को पिन्डदान कहते है दझिण भारतीय पिन्डदान को श्राद्ध कहते है
श्राद्ध के प्रकार
शास्त्रों में श्राद्ध के निम्नलिखित प्रकार बताये गए हैं
1. नित्य श्राद्ध : वे श्राद्ध जो नित्य-प्रतिदिन किये जाते हैं, उन्हें नित्य श्राद्ध कहते हैं. इसमें विश्वदेव नहीं होते हैं.
2. नैमित्तिक या एकोदिष्ट श्राद्ध : वह श्राद्ध जो केवल एक व्यक्ति के उद्देश्य से किया जाता है. यह भी विश्वदेव रहित होता है. इसमें आवाहन तथा अग्रौकरण की क्रिया नहीं होती है. एक पिण्ड, एक अर्ध्य, एक पवित्रक होता है.
3. काम्य श्राद्ध : वह श्राद्ध जो किसी कामना की पूर्ती के उद्देश्य से किया जाए, काम्य श्राद्ध कहलाता है.
4. वृद्धि (नान्दी) श्राद्ध : मांगलिक कार्यों ( पुत्रजन्म, विवाह आदि कार्य) में जो श्राद्ध किया जाता है, उसे वृद्धि श्राद्ध या नान्दी श्राद्ध कहते हैं.
5. पावर्ण श्राद्ध : पावर्ण श्राद्ध वे हैं जो भाद्रपद कृष्ण पक्ष के पितृपक्ष, प्रत्येक मास की अमावस्या आदि पर किये जाते हैं. ये विश्वदेव सहित श्राद्ध हैं.
6. सपिण्डन श्राद्ध : वह श्राद्ध जिसमें प्रेत-पिंड का पितृ पिंडों में सम्मलेन किया जाता है, उसे सपिण्डन श्राद्ध कहा जाता है.
7. गोष्ठी श्राद्ध : सामूहिक रूप से जो श्राद्ध किया जाता है, उसे गोष्ठीश्राद्ध कहते हैं.
8. शुद्धयर्थ श्राद्ध : शुद्धयर्थ श्राद्ध वे हैं, जो शुद्धि के उद्देश्य से किये जाते हैं.
9. कर्मांग श्राद्ध : कर्मांग श्राद्ध वे हैं, जो षोडश संस्कारों में किये जाते हैं.
10. दैविक श्राद्ध : देवताओं की संतुष्टि की संतुष्टि के उद्देश्य से जो श्राद्ध किये जाते हैं, उन्हें दैविक श्राद्ध कहते हैं.
11. यात्रार्थ श्राद्ध : यात्रा के उद्देश्य से जो श्राद्ध किया जाता है, उसे यात्रार्थ कहते हैं.
12. पुष्टयर्थ श्राद्ध : शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक पुष्टता के लिये जो श्राद्ध किये जाते हैं, उन्हें पुष्टयर्थ श्राद्ध कहते हैं.
13. श्रौत-स्मार्त श्राद्ध : पिण्डपितृयाग को श्रौत श्राद्ध कहते हैं, जबकि एकोदिष्ट, पावर्ण, यात्रार्थ, कर्मांग आदि श्राद्ध स्मार्त श्राद्ध कहलाते हैं.
कब किया जाता है श्राद्ध?
श्राद्ध की महत्ता को स्पष्ट करने से पूर्व यह जानना भी आवश्यक है की श्राद्ध कब किया जाता है. इस संबंध में शास्त्रों में श्राद्ध किये जाने के निम्नलिखित अवसर बताये गए हैं –
1. भाद्रपद कृष्ण पक्ष के पितृपक्ष के 16 दिन.
2. वर्ष की 12 अमावास्याएं तथा अधिक मास की अमावस्या.
3. वर्ष की 12 संक्रांतियां.
4. वर्ष में 4 युगादी तिथियाँ.
5. वर्ष में 14 मन्वादी तिथियाँ.
6. वर्ष में 12 वैध्रति योग
7. वर्ष में 12 व्यतिपात योग.
8. पांच अष्टका.
9. पांच अन्वष्टका
10. पांच पूर्वेघु.
11. तीन नक्षत्र: रोहिणी, आर्द्रा, मघा.
12. एक कारण : विष्टि.
13. दो तिथियाँ : अष्टमी और सप्तमी.
14. ग्रहण : सूर्य एवं चन्द्र ग्रहण.
15. मृत्यु या क्षय तिथि.
क्यों आवश्यक है श्राद्ध?
श्राद्धकर्म क्यों आवश्यक है, इस संबंध में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं –
1. श्राद्ध पितृ ऋण से मुक्ति का माध्यम है.
2. श्राद्ध पितरों की संतुष्टि के लिये आवश्यक है.
3. महर्षि सुमन्तु के अनुसार श्राद्ध करने से श्राद्धकर्ता का कल्याण होता है.
4. मार्कंडेय पुराण के अनुसार श्राद्ध से संतुष्ट होकर पितर श्राद्धकर्ता को दीर्घायु, संतति, धन, विघ्या, सभी प्रकार के सुख और मरणोपरांत स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदान करते हैं.
5. अत्री संहिता के अनुसार श्राद्धकर्ता परमगति को प्राप्त होता है.
6. यदि श्राद्ध नहीं किया जाता है, तो पितरों को बड़ा ही दुःख होता है.
7. ब्रह्मपुराण में उल्लेख है की यदि श्राद्ध नहीं किया जाता है, तो पितर श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को शाप देते हैं और उसका रक्त चूसते हैं. शाप के कारण वह वंशहीन हो जाता अर्थात वह पुत्र रहित हो जाता है, उसे जीवनभर कष्ट झेलना पड़ता है, घर में बीमारी बनी रहती है.
श्राद्ध-कर्म शास्त्रोक्त विधि से ही करें
पित्रु कार्य कारतीक या चैत्र मास मे भी किया जा सकता है मातृदेवो भव पितृदेवो भव

पितरो की शांति हेतु त्रिपिण्डी श्राद्ध, नारायण बलि कर्म, महामृत्युंजय मंत्र जाप और श्रीमद् भागवत कथा कराये।
*(1) त्रिपिण्डी श्राद्ध*- यदि किसी मृतात्मा की लगातार तीन वर्षों तक श्राद्ध नहीं किया जाए तो वह जीवात्मा प्रेत योनि में चली जाती है। ऐसी प्रेतात्माओं की शांति के लिए त्रिपिण्डी श्राद्ध कराया जाता है।
*(2)नारायण बलि कर्म*- यदि किसी जातक की कुण्डली में पित्रृदोष है एवं परिवार मे किसी की असामयिक या अकाल मृत्यु हुई हो तो वह जीवात्मा प्रेत योनी में चला जाता है एवं परिवार में अशांति का वातावरण उत्पन्न करता है। ऐसी स्थिति में नारायण बलि कर्म कराना आवश्यक हो जाता है।
(3) मृतात्मा की शांति के लिए भी *महामृत्युंजय मंत्र* जाप करवाया जा सकता है। इसके प्रभाव से पूर्व जन्मों के सभी पाप नष्ट हो जाते है।
(4)पितरो की आत्मा की शांति के लिए *श्रीमद्भागवत का पाठ* कराना चाहिए।श्रीमद् भागवत कथा सुनने से प्रेत योनि से मुक्ति हो जाती है।और परिवार के लिए सुख शांति प्राप्त होती है। इस बार 16 नहीं 15 दिन ही हैं श्राद्ध
सोलह श्राद्ध का संयोग इस वर्ष 15 दिन का होगा!
हर साल पितरों की शांति और तर्पण करने के लिए भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक के काल में किया जाता है।
पूर्वजों का तपर्ण करना हिन्दू धर्म में बहुत ही पुण्य का काम माना जाता है। पुण्य के साथ तर्पण हिन्दू धर्म में बहुत अहम काम माना जाता है। हिन्दू मान्यता के हिसाब से किसी भी व्यक्ति की मृत्यु के बाद श्राद्ध करना बेहद जरूरी होता है। मान्यत है कि अगर मृत मनुष्य का विधिपूर्वक श्राद्ध और तर्पण ना हो पाए तो उसे इस लोक (पृथ्वी लोक) से मुक्ति नहीं मिलती और वह भूत बनकर इस पृथ्वी पर भटकता रहता है, जिसे अन्य शब्दों में कहते हैं कि मोक्ष प्राप्त नहीं होता।
तर्पण का महत्व
पुराणों में एक पुराण है ब्रह्म वैवर्त, जिसके अनुसार भगवान को खुश करने से पहले मनुष्य को अपने पितरों यानि पूर्वजों को प्रसन्न करना अति आवश्यक है। ज्योतिष के अनुसार भी कुंडली में पितृ दोष पाया जाता है। जिसे अब तक का सबसे बड़ा दोष माना गया है। यह दोष यदि एकबार लग जाए तो पीढ़ी दर पीढ़ी कुंडली में दिखता है। जब तक की कोई इसकी शांति न करवाए। हर साल पितरों की शांति और तर्पण करने के लिए भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक के काल में किया जाता है। इसे ही पितृ पक्ष श्राद्ध कहते हैं। ऐसा कहा जाता है कि इन पितृ पक्ष के दिनों में कुछ समय के लिए यमराज पितरों को आजाद कर देते हैं ताकि वह अपने परिजनों से श्राद्ध ग्रहण कर सकें।
तिथि दिन श्राद्ध तिथियां
– 05 सितंबर, मंगलवार, पूर्णिमा श्राद्ध
– 06 सितंबर, बुधवार, प्रतिपदा तिथि का श्राद्ध
– 07 सितंबर, गुरुवार, द्वितीया तिथि का श्राद्ध
– 08 सितंबर, शुक्रवार, तृतीया – चतुर्थी तिथि का श्राद्ध (एक साथ)
– 09 सितंबर, शनिवार, पंचमी तिथि का श्राद्ध
– 10 सितंबर, रविवार, षष्ठी तिथि का श्राद्ध
– 11 सितंबर, सोमवार, सप्तमी तिथि का श्राद्ध
– 12 सितंबर, मंगलवार, अष्टमी तिथि का श्राद्ध
13 सितंबर, बुधवार, नवमी तिथि का श्राद्ध
– 14 सितंबर, गुरुवार, दशमी तिथि का श्राद्ध
– 15 सितंबर, शुक्रवार, एकादशी तिथि का श्राद्ध
– 16 सितंबर, शनिवार, द्वादशी तिथि का श्राद्ध
– 17 सितंबर, रविवार, त्रयोदशी तिथि का श्राद्ध
-18 सितंबर, सोमवार, चतुर्दशी तिथि का श्राद्ध
– 19 सितंबर, मंगलवार, अमावस्या व सर्वपितृ श्राद्ध (सभी के लिए ).

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