उत्तराखंड में चकबन्दी की असफलता-कपिल

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समाजसेवी व स्वतंत्र पत्रकार कपिल रतूड़ी ने कहा कि गहन अध्ययन करने के बाबजूद उत्तराखण्ड में चकबंदी करने में सफल नही हो पाई। अब ये कौन समझाये कि उत्तराखण्ड का परिदृश्य एक अलग प्रकृति का है और फिर हिमांचल के पहले मुख्यमंत्री डा परमार जेसे व्यकित्व की सख्त दरकार भी है। यह भी एक सत्य है और वैज्ञानिक तथ्य भी है कि खेती के मामले में परागकण अपनी भूमिका भी निभाते होंगे ।इसके लिये एक क्षेत्र बिशेष में एक ही प्रकार की खेती का होना भी जरुरी है । जहाँ तक उत्तराखण्ड में चकबन्दी का सवाल है तो यदि ये जोत चकबन्दी यहाँ लागू होती है तो निश्चित ही यह यहाँ के लिये बरदान साबित होगी। आप सोच भी नही सकते है कि इसके क्या क्या लाभ होंगे। जैसे कृषि के अंतर्गत होने वाले सारे कार्य परम्परागत खेती, बागवानी, फ्लोरीकल्चर, पशुपालन, मछली पालन, मोन पालन, रेशम उत्पादन, कुक्कट पालन, बकरी और भेड़ पालन, सब्जियों का उत्पादन, आदि को स्थानीय किसान बेहतरीन तरीके से कर सकता है। इसके अलावा बेहतरीन बाजार के लिये बिपरंण प्रणाली के सेंटर भी बिकसित होंगे ,जिससे रोजगार भी बढ़ेंगे और खुशहाली भी आएगी। जबकि स्वरोजगार के अंतर्गत होटल ,स्कूल, बडे बड़े मॉल, अस्पताल, कॉलेज , ट्रेनिंग सेंटर, व् सरकारी भवनों के लिए पर्याप्त भूमि उपलब्ध होगी, जिससे विकास की गति बढेगी। दूसरी तरफ यदि सरकार इस कार्य को सफल तरिके से अंजाम नही देती तो इसके दुष्परिणाम भी देखने को मिलेंगे । मसलन चकबन्दी के बाद पलायन की गति बढ़ेगी, कोई जरुरी नही कि जिसके पास आज सिंचित भूमि (सेरा) अधिक मात्र में हो चकबंदी के बाद भी उसे वही भूमि उतनी मात्रा में मिले, साथ ही सरकारी राशन खा कर पली अकर्मण्यता ने और खोखली शिक्षा व्यवस्था ने यहाँ के युवा को अँधेरे में धकेल दिया है, जिसका मन अब खेती , किसानी से बेहतर किसी प्राइवेट कम्पनी की नोकरी , या होटल की नोकरी पसन्द है। जो लोग बरसो से बाहर रहते है और भूमि पर उनका मालिकाना हक आज भी है, तो क्या उनको भी चकबंदी में शामिल किया जायेगा ? इसके अतिरिक्त चकबंदी के बाद उत्तराखंड में कई खेतो को मिलाकर बने हुए बड़े बड़े चेक आसानी से एक ही व्यक्ति से बाहरी लोग खरीदेंगे , जिसे आप रोक नही सकते और उनके आचार विचार से यहाँ की संस्कृति की शुद्धता भी दूषित हो सकती है, जुर्म बढेगा । सरकारी कार्यप्रणाली को सभी जानते है, जब परिवार रजिस्टर में नाम व् जन्मतिथि गलत दर्शाई गई हो और उसे सुधारने के लिए ब्लॉक के कई चक्कर काटने पड़ते हो तो चकबंदी तो ज़मीन का मामला है , जिसकी गलतिया आदमी को पीढ़ी दर पीढ़ी झेलनी पड सकती है। उत्तराखण्ड सरकार अपनी मंशा पहले ही जाहिर कर चुकी है कि उत्तराखण्ड में चकबन्दी का आधार स्वेछिक होगा न कि कानूनन। अब ऐसी स्थिति में चकबंदी का ये प्रयास कितना सफल होता है, ये समय के गर्भ में है। पिछली सरकार में 2014 में नैनीताल जिले के रानीखेत क्षेत्र में अधिकारियो के अकर्मरयता के चलते चकबन्दी सफल नही हो पाई थी। उत्तराखंड में चकबंदी लागू करने से पूर्व सरकार को जोतो की पैमाइश / बन्दोबस्त करना जरुरी है जो कि 1960 के बाद आज तक नही हुई है। इसके अतिरिक्त उत्तराखण्ड के भूमिहीनों की स्थिति को भी स्पस्ट रूप से परिभाषित करना होगा। इसके अलावा राजस्व अधिनियम 371 के सेक्शन 18 को जिसमे भू स्वामित्व का अधिकार निहित है का पूर्ण पालन कर के ही चकबंदी कार्यक्रम उत्तराखण्ड में लागू हो, यानि कि चकबन्दी से अधिक इस प्रयास को संवेधानिक आश्रय की आवश्यकता है। सबसे अहम तथ्य 1-2-4 का फार्मूला यानि 1 अनुपात सिंचित 2 अनुपात असिंचित और 4 अनुपात बंजर/ऊसर भूमि के हिसाब से भूमिधरो को भूमि आबंटित हो और चकबंदी को अमलीजामा फहनया जा सकता है। परन्तु दूर दूर तक ऐसा दिख नही रहा है। नब्बे के दसक में अन्तर्राष्ट्रीय साजिश के तहत कृषि प्रधान देश की सरकार का विश्व व्यापार संघठन की सदस्यता और पूरे विश्व में उदारीकरण की उधार नीति ने आज उत्तराखण्ड ही क्या पूरे देश में किसानो को आत्महत्या जेसे कदम उठाने को मजबूर कर दिया। बर्तमान राज्य सरकार की मंशा भी स्पस्ट नही हो पा रही है कि वास्तव में सरकार पहाड़ में चकबन्दी चाहती भी हे या नही, या फिर किसी भू माफिया को पनपाने की साजिश हो रही है। अधूरे मन यानि पचास प्रतिशत स्वेच्छिक चकबंदी की मानसिकता पूर्ण सफलता हासिल कर पायेगी इससे आम जनता संशय में है कि कही ऐसा न हो कि पहाड़ के गरीब, भोले भाले लोगो को दिवास्वप्न दिखाकर एकमुस्त ही लूट लिया जाय।
लेखक व समाजसेवी

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